खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।
वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर।
और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है।
भीतर तक छील गयीं
कई पुराने छुपे हुए से ज़ख़्म
फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी।
हमारी सपा महासचिव अमर सिंह जी से कोई निजी खुन्नस नही है पर उनसे बच के रहने की आप सब को सलाहदेंगे।
वजह?
हमारे गाँवों में किसी किसी का पैर बड़ा ख़तरनाक माना जाता है । लोग उनकी छाया से भी बचना चाहते हैं.
अगर आप इस पर भरोसा करते हैं तो यकीन मानिये आपको अमर सिंह से भी बच कर रहना चाहिए। जहाँ जहाँअमर सिंह जी की नजर पड़ी है वहाँ वहाँ घने से घने रिश्तों में भी दरार पर गई है।
गाँधी परिवार और बच्चन परिवार को ही लीजिये। बच्चन परिवार पर अमर सिंह की कृपादृष्टि क्या हुई इन दोनोंपरिवारों में खटास पैदा हो गई.
चलिए इस एक उदाहरण को और कारणों से हुआ मान लेते हैं ।
अमर सिंह का सपा में महत्त्व क्या बढ़ा और मुलायम सिंह से नजदीकी क्या बढ़ी कि बेनी प्रसाद वर्मा जैसे पुरानेसाथी मुलायम और सपा को छोड़ कर चलते बने। यही हाल राजबब्बर का भी हुआ। सपा में अनेक लोग अमर सिंहका रोना रोते आज भी मिल जायेंगे।
अनिल अंबानी और अमर सिंह में निकटता हुई और अंबानी बंधुओं में दरार पड़ गई । ऐसी दरार कि अंबानी समूहका विभाजन हो गया और अब उनमे कारपोरेट युद्ध छिड़ा हुआ है। सपा ने केन्द्र सरकार को समर्थन क्या दियामुकेश अंबानी को प्रधानमन्त्री के दरबार तक गुहार लगानी पड़ गई।
ताजा किस्सा दत्त परिवार का है।
संजय दत्त को लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से सपा उम्मीदवार घोषित किया गया और अमर सिंह लगातार संजय दत्त केपक्ष में बोलते जा रहे हैं । कल तक जो परिवार हमेशा संजय दत्त के साथ खडा रहता था उसमे दरार पड़ गई औरभाई बहन को एक दूसरे से बात करने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है ।
ऐसे में आप सबको सलाह है कि अमर सिंह नाम की किसी भी सहायता से बच कर रहें ।
डॉक्टर अनुराग आर्य के ब्लॉग से एक शिकायत रहती है । उनके ब्लॉग का नाम तो दिल की बात है पर उनके ब्लॉग को पढने के बाद अक्सर दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ जाता है। वैसे उनके बारे में भी एक ख़ास बात है - उन्होंने एक बार कॉफी पीते-पीते कन्फेस किया था कि एक किताब को पढने के बाद उन्हें रात भर नींद नही आई थी (ज्यादा कॉफी पीने पर नींद आती है भला?)। हमें शक है तब से वो दिन में डाक्टरी करते हैं और रात में चाँद पर रिसर्च (शायद गुलज़ार के मार्गदर्शन में ) ।
खैर उनकी रिसर्च हमारी गुफ्तगू का विषय नही है । उनके ब्लॉग पर पिछली पोस्ट ख़ुदा की उम्र को लेकर एक सवाल उठाती है। हम पोस्ट पढ़ते गए और तय करते गए कि टिप्पणी देते समय क्या क्या लिखना है अंत में पहुँचकर एक सवाल सामने आ गया
"वैसे ख़ुदा की उम्र क्या होगी तकरीबन ?"
और हम अटक गए ।
डॉक्टर साहब तो सवाल उछाल कर फ़िर से डाक्टरी और चाँद पर रिसर्च में मशगूल हो गए और हम सोचते रहे।जितना ख़ुदा ने दिमाग दिया उससे ज्यादा खर्च डाला ।
सबसे पहले तो हमें याद आई राग दरबारी की । हमारे लखनऊ से ही ताल्लुक रखते हैं श्रीलाल शुक्ल साहब , रोज आते-जाते उनका घर देखते हैं और राग दरबारी को याद करते हैं। राग दरबारी में एक जगह वो पैगम्बरों की असलियत भी ज़ाहिर करते हैं। अब पैगम्बर इतने ज्यादा हैं कि चाह कर भी हम सब के बारे में शुरुआत नही मालूम कर सकते हैं सो पैगम्बरों के सहारे ख़ुदा तक पहुँचने का ख़याल छोड़ देना पड़ा।
ख़ुदा की उम्र जानने से पहले उस तक पहुंचना जरूरी है । तो पहले वही सही !
एक आम धारणा है कि खुदा जन्नत में रहता है और जन्नत की असलियत गालिब अपने साथ लेकर जन्नत चले गए और हमें बस ये दुहराने को छोड़ गए कि
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत फ़िर भी
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख़याल अच्छा है।
जन्नत की हकीकत को लेकर हमें बड़ा शक बना रहता है । कुछ न कुछ उस हकीकत में ऐसा जरूर रहा होगा कि गालिब ने शराब में ख़ुद को डुबो डाला । ऐसा भी हो सकता है कि जन्नत की हकीकत में बस इतना भर रहा हो कि वहाँ शराब पीना निहायत ज़रूरी हो और गालिब दिन-ओ-रात पीने की प्रैक्टिस करते रहे हों उम्र भर।
हमें तो मरने और जन्नत(उसमे अगर शराब पीना पड़े तो ) दोनों के नाम से बहुत डर लगता है।
कुछ लोग ऐसा नही मानते कि ख़ुदा जन्नत में रहता है। गौर फ़रमाइए
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता दे जहाँ पर खुदा न हो।
इन लाइनों से दो चीजें शीशे की तरह साफ़ हो जाती हैं । अव्वल तो ख़ुदा को बताया जाता है कि वो मस्जिद में रहता है दूजे वो मस्जिद के इतर भी कई जगहों पर देखा गया था तभी तो शायर बड़े ठसक से कह रहा है कि या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो? अब लोगबाग परेशान हो गए होंगे कि अभी इससे बोले कि तुम अमूक जगह पर जा कर पियो और क्या पता वही ख़ुदा भी मिल जाय! न जाने क्यों ये लोग ख़ुदा के पास शराब पहुँचने भी नही देना चाहते । अरे भाई उसकी मर्जी पिए न पीए आप शराबी को उसके पास बैठ कर पीने से रोक दोगे तो क्या ख़ुदा बच जायेगा? शराब जिसको पीना हो वो पी ही लेगा भले वो खुदा ही क्यों न हो।
खैर! ऐसा लगता है कि जैसे इंसान ख़ुदा को प्यारा होकर जन्नत चला जाता है वैसे ही ख़ुदा कभी जमीन की किसी चीज को प्यारा होकर जमीन पर आ गया। अब हुआ ये होगा कि पहले तो मस्जिद में किसी चीज को प्यारा हुआ होगा और उसका जमीन पर पहला ठिकाना मस्जिद रहा होगा फ़िर वो अलग अलग चीजों को प्यारा होते हुए अलग-अलग जगह पर भटकता फ़िर रहा होगा और अब किसी को पता नही है कि आख़िर ख़ुदा अब है कहाँ ।
ख़ुदा को खोजने निकलना तो हमारे बस की बात थी नही हम फ़िर से इधर-उधर देखने लगे तो दो चीजें फ़िर मिलीं
न था कुछ तो ख़ुदा था
कुछ न होता तो ख़ुदा होता।
इस बात पर यकीन करें तो ख़ुदा के होने में दो बातें हैं पहली कि जब कुछ नही था तब ख़ुदा था, दूसरी कि कुछ नही होता तो ख़ुदा होता । मतलब ये है कि अब तो बहुत कुछ है- ब्लॉग है , इन्टरनेट है कंप्यूटर है , उंगलियाँ हैं (बहुत कुछ है ) तो फ़िर अब ख़ुदा नही है? ये कैसी बात हुई कहीं और देखते हैं।
एक और लाइन है, अच्छी है-
हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है, हम हैं तो ख़ुदा भी है।
इसका मतलब ये हुआ कि अकबर इलाहाबादी साहब जब तक थे तबतक ख़ुदा था । और अब जब वो नही रहे तो ख़ुदा भी नही रहा !
ख़ुदा खैर करे ये क्या गजब है ।
हमने कहा था न कि दिल की बात पढने के बाद दिमाग का इस्तेमाल करना होता है सो हमने किया। अब शायर वगैरह जो बातें कहते हैं वो सिर्फ़ उनपर ही लागू नही होती वो सबपर लागू होती है अर्थात वो हमपर भी लागू होतीहैं॥ इसका सीधा मतलब हुआ कि जबतक हम हैं तबतक ख़ुदा है और जबसे हम हैं तबसे ख़ुदा है (उसके पहले थाया नही और होगा या नही हमसे क्या मतलब )
तो ख़ुदा की उम्र जोड़ते हैं, 1980 से 2008 - अट्ठाईस साल फ़िर एक अप्रैल, 2008 से एक जनवरी, 2009 - नौमहीने और 1 जनवरी से 11 जनवरी- 10 दिन ।
आज दिनांक 11 जनवरी 2009 को ख़ुदा की उम्र अट्ठाईस साल 9 महीने और 10 दिन है । एक अप्रैल को वो 29 साल का हो जायेगा।
जिन साहेबान को कोई ओब्जेक्शन हो वो अकबर इलाहाबादी साहब से संपर्क करें जिन्हें ख़ुदा को गिफ्ट-विफ्ट देना हो वो हमसे ।
ब्लॉग = चिटठा
ब्लॉगर = चिट्ठाकार
इन्टरनेट = अंतरजाल
जब भी कोई भाषा ऐसी चीज का प्रयोग करना शुरू करती है जिसकी शुरुआत किसी अन्य भाषा में हुई हो तो उसकेसामने ऐसी परिस्थिति आती है कि शब्दावली का क्या किया जाय। किसी भी भाषा ऐसे तमाम लोग होते हैं जिन्हेंमहसूस होता है कि किसी दूसरी भाषा की शब्दावली का प्रयोग करना यह मान लेना है कि हमारी भाषा उससेकमतर है। पर क्या ऐसा सच भी होता है?
उदहारण लेते हैं विश्व की सबसे लोकप्रिय भाषा अंग्रेजी से ;
अंग्रेजी में सबसे प्रमाणिक माने वाले शब्दकोष ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में हर वर्ष अनेको शब्द जोड़े जाते हैंउनमे से अधिकतर शब्द ऐसे होते हैं जो किसी न किसी अन्य भाषा से उधार लिए गए होते हैं और अंग्रेजी बोलनेवाले अनेक लोग उनका प्रयोग कर रहे होते हैं । ऑक्सफोर्ड में जोड़े जाने के बाद उन शब्दों के प्रयोग को एकवैधानिकता सी मिल जाती है और अंग्रेजी का शब्दकोष और लोकप्रियता बढती रहती है।
फर्ज कीजिये आप अंग्रेजी में लिख रहे हैं और कहीं पर आपको पान लिखना हुआ । आप बीटल लीव्स का प्रयोग करसकते हैं पर उससे पान का सही मतलब ज़ाहिर नही हो सकता । दूसरा तरीका है कि आप पान ही लिखें । जो पानसे अपरिचित हैं उन्हें बीटल लीव्स और पान दोनों के मायने देखने होंगे कि आख़िर बीटल लीफ या पान खाने केमायने क्या हैं पर जो पान से परिचित हैं उन्हें ज्यादा समझ पान लिखने से ही आएगा।
हमारा कहने का आशय है कि कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अपने साथ साथ एक बड़ा सन्दर्भ साथ लेकर चलते हैं आनेजैसे ही उनका अनुवाद किया वो सन्दर्भ से कट जाते हैं और कमोबेश अर्थहीन हो जाते हैं। हमने विदेशियों से जबभी कभी बात की , इस बात का ध्यान रखा कि सन्दर्भ साथ लेकर चलने वाले शब्द अपरिवर्तित रहें उनके मायनेसमझा दिए जाय। यह श्रमसाध्य हो सकता है परन्तु एक गहरा संदेश साथ लेकर चलता है।
शब्दों को उनके मूल में ही रहने देना उर्दू में भी ख़ूब रहा है। वस्तुतः उर्दू का जन्म लश्करों में हुआ और इस भाषा नेकई भाषाओँ के शब्दों का जस के तस् प्रयोग करना जारी रखा । यही कारण है कि उर्दू जहाँ भी गई लोगों में गहरे सेपैठ गई।
यहाँ इस पूरी बहस का उद्देश्य यही रहा कि किसी ने हमसे पूछा कि यह चिट्ठा कैसा बेतुका सा नाम है पहली नजरमें तो यह नकारात्मक सा नजर आता है ।
हमें भी महसूस होता रहा है कि जब हम बस, ट्रेन, कंप्यूटर, आदि न जाने कितने शब्दों के लिए हिन्दी शब्द खोजनेऔर बनाने के चक्कर में नही पड़े तो ब्लॉग, ब्लोगर, और इन्टरनेट के लिए ऐसा करने की क्या ख़ास जरुरत है? हिन्दी बढेगी तो अपनी जीवन्तता से न कि शुद्धता के अनावश्यक आग्रह से।
हमारा मानना है कि जीवन्तता में लेन-देन का भी काफ़ी महत्त्व होता है ।
वैसे ये हमारा अपना विचार है आख़िर जो ऊपर लिखे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उन्होंने भी तो कुछ सार्थक ही सोचाहोगा !

यह सवाल हमारे मन में उठा एक कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक मित्र के एक कथन से।
हमारे एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि एक जगह पर राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का प्रयोग किया जाय। उन्हें इस बात पर आपत्ति थी। उनका कहना हुआ कि राष्ट्रीय ध्वज में भगवा रंग उन्हें नही पसंद है इससे साम्प्रदायिकता की झलक मिलती है। यह सोच हमें अचंभित कर गई।
हम इस बात के पक्ष में नही रहते कि किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रीय चिन्हों का सम्मान करना जरूरी है देशभक्त होने के लिए। हमारा मानना है कि देशभक्ति राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान पर निर्भर नही करती बल्कि यह तो व्यक्ति की सोच पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान और उनके प्रति प्रेम दिखने वाले कई लोग अपने कृत्यों से वस्तुतः राष्ट्रविरोधी होते हैं और इन बातों को महत्त्व न देने वाले कई लोग अपने कृत्यों से राष्ट्रभक्त होते हैं।
हमें उन मित्र की राष्ट्रीय ध्वज सम्बन्धी सोच पर ऐतराज न होता अगर उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को साम्प्रदायिक बताने की अपनी सोच के पीछे कारण सिर्फ़ उसमे भगवा रंग का होना न बताया होता । तब ये सिर्फ़ उनकी सोच होती जो किसी के लिए सही और किसी के लिए ग़लत होती अगर वो भगवे के साथ हरे रंग का भी जिक्र कर देते ।
अगर भगवा रंग साम्प्रदायिकता की झलक है तो हरा रंग इससे अछूता कैसे है? यह सिर्फ़ अंध हिंदू विरोध का प्रमाण है कि उन्होंने सिर्फ़ भगवा रंग का जिक्र किया । सच तो यह है कि अगर कट्टरपंथी हिंदू धर्म में हैं तो और धर्मों में भी हैं। जितनी आलोचना हिंदू कट्टरपंथियों की होनी चाहिए उतनी ही और मजहबों के कट्टरपंथियों की भी। इस तरह की एकतरफा सोच रखने वाले कट्टरपंथियों से भी अधिक भ्रमित होते हैं और निंदनीय होते हैं।
वस्तुतः हिन्दी में भगवा और केसरिया अलग अलग अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते हैं । भगवा रंग जहाँ सांप्रदायिक अर्थों के लिए प्रयोग किया जाता है वहीँ केसरिया बलिदानी भावना के लिए प्रयोग किया जाता है और हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रंगों के लिए केसरिया ही प्रयोग में आता है। केसरिया और भगवे में कोई अन्तर रंग का होता है या नही हमें नही पता पर भावनाओं का अन्तर जरूर होता है और इस अर्थ में हरा रंग ज्यादा सांप्रदायिक हो सकता है उन लोगों के लिए जो रंगों को साम्प्रदायिकता से जोड़ते हैं।
बहरहाल ऐसी सोचें राष्ट्रीय ध्वज के विकास की प्रक्रिया की जानकारी के अभाव के चलते होती है या फ़िर किसी एकमानसिकता में इतना रंग जाने पर कि और रंग दिखाई ही न पड़ें ।
एक दिन कभी
शायद हम फिर मिलें
जीवन के किसी मोड़ पर
यूँ ही भटकते हुए
तब शायद हम ढोंग करें
एक-दूसरे को न जानने का।
या फिर हम पहचान लें
और थोड़ा मुस्कुरा कर कहें
“अच्छा लगा तुमसे मिलकर”
और कर के कुछ इधर-उधर क़ी बातें
अचानक कोई ज़रूरी काम याद आने की बात कहकर
थोड़ा और मुस्कुराएंगे
और अलग होंगें कह कर
फिर से मिलने क़ी उम्मीदों के बारें में ।
लेकिन ये सब कुछ
शुरू से ही झूठ होगा
धोखा होगा ख़ुद से ही
उस वक़्त हमे मिलना पसंद न आए शायद
भारी लगे मुस्कुराना,
दर्द दे बातें करना
और तो और
फिर से अलग होना भी परेशान करेगा
दिल रोएगा आँसू छिपा
फिर से अलग होने क़ी बेबसी से।
लेकिन कभी नही रहा
इतना समझदार ये दिल
ये फिर से मिलना चाहता है
बातें करना और मुस्कुराना चाहता है
ज़ख़्मों को फिर से खोल-खोल कर
फिर-फिर से रोना चाहता है।
आप रजत पदक जीतते नही हैं स्वर्ण पदक हारते हैं.
Posted by roushan in खेल जगत, देश-दुनिया, हमारी बात, हीरो
पिछले साल की बात है हम रिमोट लेकर चैनेल बदल रहे थे अचानक एकसमाचार चैनेल पर ओलंपिक में जा रहे भारतीय खिलाड़ियों का साक्षात्कार देखकर रुक गए । उस समय भारतीय मुक्केबाजों का साक्षात्कार आ रहा था औरस्क्रीन पर थे अखिल कुमार। हमें मुक्केबाजी के बारे में बस इतना ही पता थाकि एक बार भारतीय मुक्केबाज डिन्को सिंह ने एशियाड में स्वर्ण पदक जीताथा, सिडनी में एक भारतीय मुक्केबाज पदक की दौड़ तक पहुँचते पहुँचते रहगया था और क्यूबा के मुक्केबाज विश्व में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।
"आप रजत पदक जीतते नही हैं स्वर्ण पदक हारते हैं। "
अखिल कुमार ने कहा और तभी हमें पता चल गया कि मुक्केबाजी के बारे में कुछ और जानना होगा क्योंकि भारतीय मुक्केबाज आने वाले समय में विश्व स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करने कि क्षमता रखते हैं।
हम खेल भावना से खेल देखने वाले दर्शकों में से नही हैं। कुछ एक खेलों छोड़ कर वही खेल देखना पसंद करते हैंजहाँ भारतीय खिलाडी अच्छा प्रदर्शन कर रहे होते हैं। कई सालों तक हमें लिएंडर पेस बहुत पसंद रहे थे क्योंकि हमेंउनमें कमाल का जुझारूपन आता है । डेविस कप में लिएंडर और गोरान इवानसेविच के बीच दिल्ली में हुआ वोमैच भुलाए नही भूलता जब 0-2 से पिछडे लिएंडर ने कमाल की वापसी की और घरेलु दर्शकों की हूटिंग को अपनेलिए प्रेरणा का श्रोत बनाते हुए गोरान को हरा दिया। लिएंडर में वो जुझारू पन था जो मैच देख रहे दर्शक को उत्साहसे भर देता था।
जब पिछले साल हमने अखिल की बात सुनी तो हमें वो भारतीय खेलों के नए जुझारू चेहरे के रूपमें नजर आए।ओलंपिक के दौरान भारतीय मुक्केबाज सिर्फ़ एक कांस्य ही जीत सके और अखिल तो सेमी फाइनल भी नही पहुंचेपर अखिल का खेल शानदार रहा और भारतीय मुक्केबाजों ने आने वाले समय के लिए उम्मीद जगाई।
ओलम्पिक्स में दू
सरा शानदार प्रदर्शन हमें साइना नेहवाल का लगा जिसने पदक तो नही जीता पर उम्मीदें जरूरजगा दीं। इसमें कोई शक नही कि अगर वो खेल पर ध्यान देती रहीं तो वो विश्वमें सर्वश्रेष्ठ बनने की कूव्वत रखती हैं।
हमेशा की तरह साल भर क्रिकेट को मिलने वाली वरीयता की चर्चा रही और कईअन्य खेलों के खिलाड़ियों ने इस पर बोला भी। हमें लगता है कि अगर भारतीयक्रिकेट बोर्ड अपने खेल की बेहतर मार्केटिंग के जरिये ज्यादा पैसा कमा रहा हैतो इससे दूसरे खेल संघों को जलने की जगह सीख लेनी चाहिए। आज भारतीयक्रिकेट संघ विश्व क्रिकेट में सबसे संघ माना जाता है । इस मायने में हमेंभारतीय क्रिकेट संघ का अनुसरण करना चाहिए कि कैसे उसने भारतीय बाजारकी ताकत को भुनाया है।क्रिकेट से ज्यादा लोकप्रियता फुटबोंल, होंकी , टेनिस जैसे खेल कमा सकते हैं और पैसाभी। पर जब तक इन खेलों के खिलाडी विश्वस्तर पर श्रेष्ठतम खिलाड़ियों में शामिल नही होते तब तक लोगों कीरूचि जागना सम्भव नही है। आज गिनती के खिलाडी हैं अन्य खेलों में जो विश्वस्तर पर श्रेष्ठतम में शामिल होते हैं, और आनंद जैसे जो हैं उन्हें क्रिकेटर्स सा सम्मान भी मिलता है । आनंद की लोकप्रियता उतनी नही है शायद परइसका कारण दर्शकों का जुडाव शतरंज में हो न पाना है।
क्रिकेट देश के खेल प्रेमियों को जीत का उत्साह देता है। जहाँ अन्य कई खेलों में हम कहीं नजर नही आते वहाँक्रिकेट में हम सबसे ऊपर के देशों में नजर आते हैं। इसलिए लोगों में क्रिकेट का क्रेज स्वाभाविक है।
उम्मीद करते हैं की आने वाले समय में भारतीय खिलाड़ी जीतों में निरंतरता के साथ क्रिकेट को लोकप्रियता मेंरचनात्मक टक्कर देंगे और अन्य खेल संघ भारतीय क्रिकेट बोर्ड की तरह प्रभावशाली भुमिका अदा करने कीकोशिश करेंगे ।
कसमसाहट सी कभी
उबलते हुए सवालों में,
आकुल रहती थीं ऊर्जाएं
उफनकर बह निकलने को
दहकती आग सी होती थी
हर सख्त-ओ-नर्म कोनों में
सुना भर है हमने ।
नही उठते हैं सर अब तो
बढ़ते नही हैं आगे
तरेरकर आँखें
सुलगते हुए सवाल।
आग तो बहुत दूर
अब तो महसूस नही होती गर्मी तक
कहीं आस पास ।
इससे पहले कि बहता हुआ लहू
जम जाए शिराओं में ही
पिघलानी होगी बर्फ
जो जम चुकी है
हमारे चारो ओर ।

