अब हिन्दी में भी फ्लोक ब्राउजर से ब्लोगिंग  

Posted by roushan in

जिन लोगों ने कभी फ्लोक ब्राउजर इस्तेमाल किया होगा उन्हें यह ब्राउजर काफ़ी पसंद आया होगा। कुछ समय पहले कुन्नु भाई ने इसपर अपने ब्लॉग में लिखा भी था। तब इसके साथ एक बड़ी परेशानी इसमें हिन्दी सही से न दिख पाने वाली थी । फ्लोक इस्तेमाल करने के बाद से हम लगातार खोज रहे थे कि किस तरह इसका इस्तेमाल हम जैसे हिन्दी वाले भी कर सकें। इसके लिए हमने फ्लोक को बाकायदा मेल भी किया था।
अभी कल हमने नए संस्करणों के लिए फ्लोक की वेबसाइट चेक की तो पता चला उन्होंने २.० संस्करण उतारा है और ये संस्करण देखने के बाद हमारा खुशी का ठिकाना नही रहा क्योंकि अब इसमे हिन्दी न सिर्फ़ सही दिख रह है बल्कि हिन्दी लिखी भी जा सकती है।


फ्लोक की सुविधाओं में इसमें इन बिल्ट फोटो अपलोडर, ब्लॉग एडिटर , मीडिया बार जैसी सुविधाओं का होना है। फीड रीडर से आप सीधे अपने फ्लोक पेज पर मनपसंद ब्लोग्स और वेबसाइट्स की ताजा चीजें पढ़ सकते हैं।
फ्लोक को वास्तव में सोशल ब्राउजर के रूप में प्रचारित किया जाता है और यह काफ़ी हद तक इसके फीचर्स देखने पर सही भी लगता है। यह सभी प्रमुख ब्लॉग्गिंग साइट्स और सोशल नेट्वर्किंग साइट्स के अपडेट्स सीधे आपके फ्लोक होम पेज पर देखने की सुविधा देता है



वस्तुतः फ्लोक मोजिला पर आधारित ब्राउजर की श्रेणी का एक ब्राउजर है और यह फायर फॉक्स के ३.० संस्करण की श्रेष्ठतम सुविधाओं का उपयोग करता है। मल्टी टास्किंग के लिए यह सबसे अच्छा ब्राउजर है।
आप फ्लोक यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं।

ब्लॉग एडीटर: ब्लॉग एडीटर की अब यही कमी रह गई है कि आपको हिन्दी में कॉपी-पेस्ट मारना पड़ेगा यहाँ पर
खैर तब तक इस सोशल ब्राउजर के फीचर्स का आनंद तो लिया ही जा सकता है .

पलाश के फूल!  

Posted by निशा in ,



एक दोस्त के ब्लॉग पर पलाश के फूल पर कविता पढ़ने को मिली तो मन किया कुछ लिखना चाहिए।

पलाश के फूल से पहला परिचय!, आज सोचती हूँ तो हंसी आती है।

बहुत पहले की बात है। एक दिन हम कुछ दोस्त एक गेम खेल रहे, थे जिसमे हमे कुछ गेस करने होते थे। मुझे जिसके बारे मे गेस मारने थे, उसका पसंदीदा फूल पलाश का फूल था और तब तक मुझे पता ही नही था की ये चीज़ क्या होती है। मेरा गेस ग़लत निकला। मैने ये मानने से मना कर दिया कि ऐसा कोई फूल होता भी है तो उसने एक कविता की लाइने बतायीं-

आए महंत बसंत

बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
मैं थोड़ा फ्र्स्टू टाइप की थी मुझे लगा कि उसने मुझे ग़लत गेस करने के लिए ही पलाश का फूल चुना था।

मै उससे जम कर गुस्सा हुई और कई दिन तक बात नही की।

काफ़ी दिन बाद मुझे खुद ही अपना गुस्सा भूलना पड़ा, क्योंकि उसने मेरे गुस्से को नोटिस ही नही किया।

बहुत दिन बाद जब उसे बताया कि मै उससे इस बात को ले कर गुस्सा थी तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा कि अब कभी गुस्सा होना तो प्लीज़ बता देना कि तुम गुस्सा हो नही तो हमे पता ही नही चल पाएगा।

उसके बाद आजतक जब किसी को ये फूल पसंद करते हुए सुनती हूँ तो हँसी आती है खुद पर। जब किसी की कोई पसंद अनोखी होती है तो लगता है कि ये ही पसंद क्यों? किसी को पलाश का फूल पसंद है तो ज़रूर इसके पीछे कोई वजह होगी। हमारी कुछ उम्र ही ऐसी थी कि हम गेस करते थे कि कुछ इश्क-विश्क जैसा मामला होगा। हमने बहुत कोशिश की पता लगाने की।

लेकिन एक चुप तो हज़ार चुप!

कभी पता ही नही लगा कि आख़िर क्या कोई ऐसा मामला था। उसकी इस फूल की दीवानगी अभी तक है और उसके जन्म दिन के दिनो मे ही पलाश का फूल खिलता है मज़े की बात है कि वो इकट्ठा करता है ढेर सारे फूल अभी तक.



बेकार की फतवेबाजी  

Posted by roushan in ,

मौलाना फिरंगीमहली ने बच्चन की मधुशाला के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया है।उन्होंने बताया कि फतवा जारी करने से पहले उन्होंने मधुशाला को पढ़ा औरकुछ पंक्तियों को गैर इस्लामी पाया।

वो
इस्लाम की व्याख्या कैसे करते हैं हमेंनही पता आख़िर वो मौलाना हैं इस्लाम की जैसे चाहे व्याख्या करने को आजादहैं पर वो साहित्य की व्याख्या करने की हैसियत में आते हैं या नही इसपर हमें सख्त ऐतराज है।

बच्चन ने मधुशाला के साथ ही उमर खैय्याम की रुबाइयों का भी अनुवादकिया। इन में भी मय, मधुशाला और साकी जैसी चीजें बड़ी मात्रा में आई हैं औरमधुशाला पढने वाला और समझने वाला शख्स यह बता सकता है कि इन चीजों का दार्शनिकता से गहरा नाता है।बच्चन ने मधुशाला कि जो प्रस्तावना लिखी है वह बेहद खूबसूरत है और मधुशाला की दार्शनिक समझ को पाठकोंके सामने पेश करती है। शायद मौलाना साहब ने उससमझने की कोशिश नही की होगी।

मौलाना साहब यह भी नही समझ पाये कि शराब के मायने क्या हैं और इस्लाम से उसका क्या सम्बन्ध है।

जब बच्चन बताते हैं कि मधुशाला प्रेम सिखाती है तो वह मजहबी जुनूनों को कटघरे में खड़ा करते है और इंसानी रिश्तोंके महत्त्व को बतलाते हैं। मजहबों की तारीख बताई जा सकती है पर इंसानी रिश्ते तारीखों से परे हैं और अगरमजहबी जूनून इन रिश्तों में ज़हर घोल रहे हैं तो ये मजहब को समझना होगा कि वो इन जुनूनों के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आए कि उस पर ऊँगली उठाने वालों के ख़िलाफ़।

हमने मधुशाला और बच्चन की शराब से जुड़ी जितनी चीजें पढ़ी हैं हर जगह प्रेम, दार्शनिकता और जिंदगी के जज्बेको पाया है और इसीलिए हमें पता है कि जो अदब को समझने वाले होंगे वो पढ़ते रहेंगे इसे।

फिरंगीमहली साहब ये फतवा बेकार की कसरत है, इन बातों में पड़ने की जगह अगर बड़े और जरूरी मुद्दों परध्यान दिया जाय तो बेहतर होगा।

आपसी सामंजस की ज़रूरत है!  

Posted by रेवा स्मृति (Rewa) in , ,

मैं नारी और पुरुष के आपसी सामंजस की बात कर रही हूँ, और दोनों को एक ही धुरी पर चलने की बात कर रही हूँ. मैं भूत के आधार पर वर्तमान की बात ना कर, बल्कि भविष्य के बारे में सोच, उसे आधार मानकर वर्तमान में बात कर रही हूँ. आने वाले पीढ़ी के बारे में सोच आज को सकारात्मक रूप देने का प्रयास दिमाग़ में रख उसके बारे में चर्चा कर रही हूँ. यह कहना अतिशयोक्ति नही होगा कि नारी और पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक दूसरे के बिना समाज़ के बारे में हम नही सोच सकते हैं, क्योंकि नारी और पुरुष एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं!

मेरा मानना है, आप भूत के आधार पर भविष्य की कल्पना नही कर सकते. हमारा वर्तमान भविष्य का मार्ग दिखाता है. आज अगर नारियाँ ये आवाज़ उठाती हैं कि उन्हें बराबरी का हिस्सा चाहिए तो उन्हें खुद ही आगे आनी होगी और ये सोचना होगा कि किस तरह पुरुषों से कंधे मिलाकर चल सके. पुरुषों के तरह संघर्ष करने में खुद को पीछे छोड़, और आरक्षण के बल पर वो ना तो आगे बढ़ सकती हैं, और ना बढ़ेंगी. क्योंकि सही मायने में आरक्षण का मुनाफ़ा भी उन्हें ही मिल रहा है जिन्हे वास्तव में इसकी जररूरत नही है!

आज आरक्षण की माँग ज़्यादातर बड़े शहरों की पढ़ी लिखी महिलाएँ करती हैं, लेकिन उन्हें इसकी जररूरत नही है, ये ख़ुद को बुजदिल और पुरुषों से किसी भी बात में पीछे नही मानती हैं. जररूरत किन्हें है इसकी, ये पहचानना भी बहुत ज़रूरी है. वैसे लड़कियाँ अगर ख़ुद आगे बढ़ना चाहेगी तो उन्हें कोई नही रोक सकता है, लेकिन आज भी हमारी मानसिकता में कोई ख़ास बदलाव नही आया है. मैं बहुत करीब से ज़िंदगी को देखने की कोशिश कर रही हूँ और अभी बहुत कुछ देखना बाँकी है!

अपने घर का पुरुष सभी स्त्रियों को अच्छा एवं नेक लगता है, लेकिन दूसरा नलायक. ऐसा पुरुषों के साथ भी है, उन्हें अपने घर की नारियाँ देवी लगती है, बांकी बेकार! ऐसे नज़रिया को बदलना बहुत ज़रूरी है. सभी इंसान में अच्छाई और बुराई होती है, इसका मतलब यह नही की पूरे समाज़ पर दोषारोपण करना चाहिए. अगर कोई भी नारी सशक्तिकरण की बात करती हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने आस पास के झुग्गी झोपड़ी में जाकर दीप जलाने की बात करनी चाहिए, क्योंकि आज इसकी जररूरत है!

आवाज़ उठाने से पहले एक कदम आगे बढ़कर वहाँ सार्थक काम करने की ज़रूरत है, फिर ख़ुद बख़ुद सभी में बदलाव आएगा. हमे समाज में बदलाव लाने के लिए खुद ही आगे बढ़ना होगा, इसलिए ज़रूरत है ख़ुद के अंदर झाँकने की, अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाने की. ख़ुद बदलो सब बदलेगा!

और हाँ, ये पोस्ट मैं बहसबाज़ी करने के लिए नही लिखी हूँ, आप कृपया यहाँ सजेशन दे सकते हैं कि हम कैसे एक सार्थक समाज के बारे में सोचें एवं हमें इसके लिए क्या करना चाहिए. अगर ये नही हो सकता है तो फिर आराम से इग्नोर करें.


इस विषय पर और चर्चा के लिए यहाँ जाएँ

कष्ट में हम हिंदू भी हैं  

Posted by निशा in ,

आज भगवान् कि बड़ी याद आई कुछ नही समझ में आया तो सोचा कि कुछ लिख ही डाला जाय।
मेरा घर थोड़ा धार्मिक प्रवृत्ति वाला रहा है और धार्मिक कामों में सब को हमेशा खुशी का अनुभव होता रहा है।हमारा हिंदू धर्म भी कितना रोचक है इत्ती संख्या में देवी देवता और चुनने की आजादी कि क्या कहिये. कितनीमजा आती है कि आप किसी की भी पूजा कर सकते हैं. गाय को पूजिए या गंगा को, हनुमान जी के आगे मत्थाटेकिये या फ़िर दुर्गा जी की आरती कीजिये. चाहे एक साथ सब की पूजा कीजिये. मेरे घर के छोटे से मन्दिर मेंकुछ नही तो -१० भगवानो को जगह मिली हुई है और सब बड़े प्रेम से एक दुसरे के साथ रहते हैं.
इत्ते देवी देवताओं में मेरे पसंदीदा हनुमान जी रहे हैं। वैसे तो सबसे सुंदर गणेश जी लगते हैं पर जो भोलापन औरसुन्दरता हनुमान जी में है वो किसी और में नही दिखती . भला हर कोई भक्ति के लिए ख़ुद को सिन्दूर से कहाँढक सकता है.
मेरे गाँव में एक छोटा सा मन्दिर जैसा है जिसमे हनुमान जी विराजमान हैं। एक पेड़ भी है पीपल का जिसपे भैरोबाबा की पूजा होती है और वहीँ पर एक छोटा सा शिवलिंग भी है. वहीँ पास में एक पोखरा है वहां तीज त्योहारों परपूजा होती है पोखरे में मछलियाँ है लेकिन उन्हें मारा नही जाता मछली पकड़ने वाले दुसरे तालाबों का सहारा लेतेहैं.
ये मन्दिर, पेड़ के भैरो बाबा और शिवलिंग और पोखरा गाँव के लोगों के जीवन में शामिल हैं। शादी व्याह , जन्म-मृत्यु होली-दिवाली सब में भागी दार होते हैं. गाँव से जब शादी हो के लड़की विदा होती है तो विदा लेने इनतक भी जाती है.
कभी कभी कोई साधू बाबा आते थे ( अब शायद ऐसे साधू बाबा नही आते ) पोखरे के पास किसी का बगीचा है उसमेवो ठहरते और कीर्तन आदि करते रहते। गाँव वालों के लिए अच्छा मौका होता था हर किसी के घर से थोड़ा बहुतआटा दाल जाता . साधू बाबा लोग ख़ुद अपना खाना वहीँ बगीचे में बनाते और खाते. कभी एक दिन पता चलता किवो चले गए किसी और जगह.
इन साधू बाबा लोगों से कोई उनका घर जाती वगैरह नही पूछता था और इनके पास कुछ रहता भी नही था एकपोटली के सिवा। बगीचे में रहने के दौरान गाँव वालों ने जो दे दिया वो खा लिया और आशीष दिया और चलते बने.
हमारे देश में सब कुछ ऐसे ही सहज बना रहता था.
जो बाहर जाते वो कुछ और जगह पूजा करने का सुख पाते। मुझे खूब घूमने का मौका मिला बचपन से ही।फैजाबाद में अयोध्या की हनुमान गढ़ी, बड़ी बुआ बनारस में संकट मोचन, दिल्ली में हज़रात निजामुद्दीन, अजमेर शरीफ, मुंबई में हाजी अली सिद्धि-विनायक, विन्घ्याचल में अष्टभुजी , वैष्णो देवी एक लम्बी लिस्ट हैऔर हर जगह श्रद्धा अपने आप जग जाती रही है. हाँ देश के बाहर चाहे जितना अच्छा मन्दिर, दरगाह, चर्च होवहां श्रद्धा की जगह कौतुहल होता है एक नई चीज देखने का . पर इन सब जगहों के बावजूद जब मुसीबत मेंभगवान् की याद आती है तो फ़िर गाँव का वही छोटा सा हनुमान मन्दिर याद आता है. जब साधू संतों की बातआती है तो वही अनजाने से साधू बाबा याद आते हैं जिनको शायद याद सँभालने के बाद कभी देखा भी नही है.
सच अपने देश में धर्म इतना ही सहज रहा है
पर आज लगता है कि चीजें बदल रही हैं। बड़े बड़े नाम वाले और बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले महंत नए साधू हैं.
गाँव का मन्दिर ठीक हों हो पर आजकल रामसेतु जिसकी कभी पूजा भी की हो जरूर बचा रहना चाहिए।
चलो ये भी ठीक है जो माने उनके संत, जो माने उनके मन्दिर पर बुरा तो तब लगता है जब ये लोग मेरे अपने देशको मेरे अपने धर्म के नाम पर बाटना चाहते हैं. बुरा तब लगता है जब कोई जाने कैसे बना पीठाधीश धर्म केनाम पर अपने ही देश के उन लोगों को मरना चाहता है जिनकी गलती सिर्फ़ इतनी है कि वो उसी धर्म के हैं जिसधर्म के कुछ लोगो ने इन बाबाओं जैसे ही ग़लत काम किए.
हमारे सहज और सुंदर समाज में जहर घोला जा रहा है. ये दोनों धर्मों के धमाके करने वाले लोगों की मिलीभगतहो तो कोई आश्चर्य नही.
आज जब मै भगवान् को याद कर रही थी तो अपने गाँव की याद आई अपने भगवानो की याद आई।
मैंने अपने उस छोटे से मन्दिर के छोटे से हनुमान जी से पूछा कि क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है?
वो वैसे ही मुह पर ढेर सारा सिन्दूर पोते मुह फुलाए बैठे रहे।

मीडिया की धुन पर नाचती भाजपा और संत मंडली  

Posted by roushan in

प्रमोद महाजन के ज़माने से ही भाजपा का मीडिया मैनेजमेंट कमाल का रहता रहा है पर आजकल लगता है मीडिया की समझ भाजपा और उसके संत साथी कर पाने में असफल हो रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण है वर्तमान मालेगांव जांच पर इस समूह के बयान।
अभी कुछ दिन पहले मीडिया में जोर शोर से हंगामा मचना शुरू हुआ कि मुंबई पुलिस ने यु पीके एक विधायक से पूछतांछ करने कीअनुमति मांगी है फ़िर क्या था अटकलों का बाजार गर्म हो चला। और शुरू हो गई बयान बाजी। नाम गोरखपुर का आया और आदित्यनाथ कूद पड़े मैदान में । उन्हें लगा कि पुलिस उन तक या उनके किसी समर्थक तक पहुँचने वाली है और उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया। देश के दुसरे हिस्सों से स्व घोषित संतों के बयान भी आने लगे कोई पल्ला झाड़ता कोई मुंबई पुलिस और कांग्रेस पर आरोप लगाता । राजनाथ सिंह तो तैश भरे स्वरों में बताते रहे कि कैसे आदित्यनाथ शराफत के पुतले हैं और उनको पूरी भाजपा जानती है।
इधर मुंबई पुलिस चुपचाप कानपुर पहुंचती है और जिसे पकड़ती है उसे शायद भाजपा और उसके साथी जानते तक नही थे। सवाल उठता है कि क्या ये शोरगुल चोर की दाढ़ी में तिनके का मामला था या फ़िर भाजपा सच में यही समझ रही है कि ये कांग्रेस की चाल है और जो लोग पकड़े गए हैं वो निर्दोष हैं। क्या अगर पुलिस और सरकार हिन्दुओं को बदनाम करने कीसाजिश पर ही काम कर रही थी तो सुधाकर उर्फ़ दयानंद उर्फ़......... जाने क्या क्या को पकड़ने से अधिक बेहतर आदित्यनाथ या किसी और ऐसी मछली को पकड़ना नही रहता? पकड़े गए स्वघोषित शंकराचार्य से तो उसे वो फायदा नही मिलने वाला है अपनी साजिश में। (सुनने में आया है कि इस व्यक्ति ने महापीठाधिश्वर की उपाधि के लिए काशी विद्वत परिषद् को लाखों रूपये दिए थे सच क्या है पता नही. )

वास्तव में भाजपा को शायद उनके दोषी या निर्दोष होने की जानकारी ही नही है। उसे तो महसूस हो रहा है कि प्रज्ञा का मामला उसे चुनावी फायदा दिला सकता है आखिर कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने का अच्छा मौका है। सभी जानते हैं कि ऐसी जांचों में दोषी या निर्दोष का सवाल कोर्ट की कार्यवाही के बाद ही समझ में आ पायेगा और उसमे समय है हो सकता है चुनाओं के नाव इसी से पार हो जाय।
ऐसा ही शोर प्रज्ञा के नारको टेस्ट को लेकर मचा हुआ है। लोग कह रहे हैं कि उसके टेस्ट में कुछ नही मिल रहा है इसलिए पुलिस बार बार उसके टेस्ट करवा रही है। जिन्हें इस टेस्ट के बारे में जानकारी होगी वो जानते होंगे कि इस टेस्ट में सवालों की एक लिस्ट होती है और उस लिस्ट के पूरे होने को टेस्ट का पूरा होना माना जाता है । अब ये लिस्ट एक सेशन में पूरी हो या कई में अब इसे आप एक टेस्ट के कई सेशन मान लें या कई टेस्ट। प्रक्रिया तभी पूरी होती है जब प्रश्न पूरे हो जाते हैं॥
अब इसे मीडिया प्रश्नों की संख्या और टेस्ट की संख्या का शोर मचाती हुई घूम रही है और भाजपा और उसके साथी उसी पर आपत्ति करते हुए।
अभी राजनाथ सिंह ने सवाल उठाया कि पुलिस के पास अगर सबूत हैं तो वह उसे जनता के सामने क्यों नही लाती । और मामलों में तो मीडिया पर विश्वास करके बयानबाजी जारी रह रही है मगर यहाँ नही । यहाँ अगर मीडिया में खबरें आ रहीं हैं कि प्रज्ञा से पूछा गया कि मृतकों की संख्या कम क्यों है या वह अपनी मोटर साइकिल के बारे में पूछती है तो इसका मतलब क्यों नही लगाया जा रहा है . क्या जो अपने मुफीद लगे उसी में मीडिया की बात मानी जानी है?
एक सवाल और भी उठता है दिल्ली में पकड़े गए युवकों के बारे में किसी ने सबूतों की मांग की होती तो उसे कैसे लिया जाता।
लगता है इस जांच के सिलसिले में लोग उन लोगों को भूल से गए हैं। लेकिन विश्वास कीजिये पुलिस नही भूली है और अभी उन्हें गुजरात पुलिस ने दिल्ली पुलिस से रिमाण्ड पर ले रखा हुआ है और गुजरात ने चार्जशीट भी दाखिल कर दी है उधर दिल्ली पुलिस नाराज है कि गुजरात पुलिस अधिक समय ले रही है और उनका काम रुका पड़ा है।
खैर चलते चलते आदित्यनाथ के बयान में शामिल एक बात। आदित्यनाथ ने अपने बयान में कहा कि अगर हिंदू समाज ऐसी (मालेगांव जैसी ) कार्यवाहियां करने ही लगे तो फ़िर तो देश सुधर ही जायेगा
सवाल यह है कि क्या इसे आग भड़काने वाली और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली बात नही माना जाय? और क्या उनकी बातों से उनके दल और उससे सम्बन्ध रखने वाले लोग सहमत हैं?

भाजपा को गाँधी नाम का सहारा  

Posted by roushan in

अभी कुछ दिन पहले एक वरिष्ठ ब्लॉगर ने हमें भाजपा पर चिंतन करने का काम सौपा था । कुछ ज्यादा सोचते तभी भाजपा ने लोक सभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की दूसरी सुचीजारी कर दी । हमें लगा शुरुआत यहीं से करना ठीक रहेगा।
भाजपा की लोकसभा उम्मीदवारों की दूसरी सूची में भी लखनऊ सीट का मामला तय नही हो पाया। कई बार से भाजपा की पहली सूची में स्थान पाने वाला लखनऊ अभी कशमकश में है। लखनऊ सीट से भाजपा में कई नाम चल रहे हैं जिसमें प्रमुख हैं लालजी टंडन, कलराज मिश्रा , मेयर दिनेश शर्मा और पूर्व मेयर एस सी राय । वैसे अटल बिहारी लड़ते तो ज्यादा अच्छा रहता हमें एक बार और उनके ख़िलाफ़ वोट देने का मौका मिलता।
खैर भाजपा की दूसरी सूची
लगता है अब भाजपा भी उत्तर प्रदेश में ख़ुद को गाँधी परिवार से फ़ायदा लेने की स्थिति में देखना चाहती है तभी तो पहली सूची में दो नाम उसी परिवार से हैं। मेनका गाँधी जहाँ अब तक जे डी यु की सीट रही आंवला से लड़ रही हैं वहीँ उन्होंने अपनी पीलीभीत सीट अपने पुत्र वरुण के लिए छोड़ दी है । वरुण का भी नाम इस दूसरी सूची में है। देखने वाली बात यह होगी किअभी तक मेनका और उनके पति संजय के ख़िलाफ़ तमाम प्रचार करती रहने वाली संघ परिवार की चरित्र हत्या ब्रिगेड क्या करती है इस ब्रिगेड के कम से कम एक स्वयंभू सदस्य हिन्दी ब्लॉग जगत में भी काफ़ी सक्रिय हैं.
अभी कुछ दिन पहले हमने उनके ब्लॉग पर तमाम अनजाने सूत्रों से प्राप्त जानकारियों का भण्डार पाया था।
एक ही हार ने जोशी जी जैसे भारत माता की धरोहर का दिल ऐसा तोड़ दिया कि संगम का त्याग करके वाराणसी का रास्ता पकड़ लिया। खैर करियर के अन्तिम समय में बनारस जाना यूँ भी धार्मिक लिहाज से उचित था .
राजनाथ सिंह जी ने लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत करके अच्छा ही किया आख़िर उच्च पद की उम्मीदवारी के किसी मौके में हो सकता है यह भी काम आ जाय ।
कल्याण सिंह , पकंज चौधरी , योगी, अशोक प्रधान और संतोष गंगवार के नामों में कोई विवाद नही था ये सब सिटिंग सांसद हैं और पिछले लोकसभा में पहुँच पाने में कामयाब लोगों को छोड़ना उचित नही था। रामपुर से मुख्तार अब्बास नकवी के अलावा कोई और प्रत्याशी नही था .
इस समूह में वाराणसी कांग्रेस के पास है और एटा और रामपुर सपा के पास है और आंवला जे डी यु के पास जब कि अन्य सीटें भाजपा के ही पास हैं। गाजियावाद नयी सीट है.
उम्मीद है इन दिग्गजों के सहारे भाजपा अपनी खोयी जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी में भाजपा को उत्तर प्रदेश से देतें मिली थीं तब से लगातार भाजपा तेजी से घटती रही है पिछले चिनावों में वह बमुश्किल दहाई का आंकडा छू पाई थी।
मजे की बात यह है कि अभी तक जिन नामों की सूची भाजपा ने जारी की है उसमे पार्टी के वरिष्ठ नेता ही रहे हैं. राजनाथ सिंह भले ही पहला चुनाव लड़ रहे हों पर वह भाजपा के अध्यक्ष हैं. इस प्रकार इस सूची में पहला चुनाव लड़ रहे वरुण का नाम कुछ तो संदेश देता ही है.

हिंसा, बदले और मानसिकताएं  

Posted by roushan in ,

फर्ज कीजिये राहुल राज का नाम रिजवान उर रहमान होता और उसने मुंबई की जगह अहमदाबाद में बस का अपहरण करने की कोशिश की होती। वहाँ पर वह कहता कि मै नरेंद्र मोदी को सबक सिखाना चाहता हूँ तो क्या होता ?
क्या उसके प्रदेश के नेता बिना पूरे देश की निंदा सहे प्रधान मंत्री से उसके मारे जाने के ख़िलाफ़ अपील कर पाते ?
क्या प्रधान मंत्री द्वारा गुजरात सरकार से स्पष्टीकरण मांगना इतने सहज तरीके से देखा जा पाता?
याद कीजिये बाटला हॉउस मामले को? क्या हर उस इंसान जिसने मुठभेड़ पर सवाल उठाये, को इतनी सहजता से लिया गया? दोनों मामलों में लोग जख्मी हुए। इंस्पेक्टर शर्मा की मौत अस्पताल में हुयी लेकिन क्या कोई कह सकता था कि उनकी मौत अवश्यम्भावी है जब उनको गोली लगी थी? क्या कोई कह सकता था कि जिस व्यक्ति को राहुल की गोली लगी थी वह बच ही जाएगा?
हम पुलिस की कार्यवाही का समर्थन नही कर रहे हैं पर बाटला हॉउस की दलीलें मुंबई में क्यों नही प्रभावी हैं? सभी न्यूज़ चैनल एक ओर से पूछ रहे हैं कि क्या राहुल को बिना मारे हल नही निकल सकता था पर जिन्होंने बाटला हॉउस में पुलिस पर प्रश्न उठाये उन्हें इतनी सहजता से क्यों नही लिया गया और जिन्हें दिल्ली पुलिस पर पूरा उन्हें मुंबई पुलिस पर यकीन क्यों नही है?
जब लालू ने कहा कि अगर नरेंद्र मोदी को सजा मिली होती तो आतंकवादी पैदा नही होते और भर्त्सना पायी पर इस मामले पर उसी तरह की बातें करने वाले सहजता से लिए जा रहे हैं।
याद करिए गुजरात के उस एन्काउन्टर को , बंजारा अभी भी जेल में है और उसे भुना कर मोदी गद्दी पर। अब बाटला हॉउस और मुंबई की बसों को कौन भुनायेगा ये सामने जल्दी आएगा।
आप कहेंगे कि इस दीवाली के पावन दिन ये शख्स ये क्या राग ले कर बैठ गया। पर क्या करें दीवाली पर बधाई देने जैसा कुछ नजर नही आ रहा है? हमारी क्या गलती है अगर हमें अपना घर बँटा हुआ हुआ दिख रहा है । क्या करें पर दिल भी तो खुश होना चाहिए न?
कल महाराष्ट्र के गृह मंत्री को टी वी पर देखा बड़े तैश में थे। गोली का जवाब गोली से बता रहे थे। उन्हें एक बिहारी कि इस हरकत पर इतना गुस्सा आ गया पर महीनों से राज और उसके गुंडों कि हरकतों पर तैश नही आया आखिर क्यों? ये मराठी और बिहारी का मामला है या फ़िर अकेले राहुल को तो गोली से वो निपटा सकते हैं और राज के गुंडों से डर लगता है? कल टी वी पर गृह मंत्री के चेहरे पर नजर आ रहा तैश क्या साबित करता है? क्या वो भी उसी मानसिकता के गुलाम नही हैं जो राज और उसके गुंडों की है। सच है कि अगर कानून व्यवस्था के नाम पर उन्हें तैश पहले आ जाता तो शायद नौबत यहाँ तक नही आती।
लोग बिहार की राजनीति की बुराई करते हैं पर कम से कम उन नेताओं में इतनी नैतिकता तो थी कि सभी दलों के नेताओं ने एकजुट हो कर बिहार में चल रही हिंसाओं की निंदा की। न जाने और लोग इतने समझ दार कब होंगे?

न्यूज़ चैनलों पर बाढ़ सी आई हुयी है । लोग हिंदू आतंकवाद शब्द लिख लिख कर उसका आनंद उठा रहे हैं। जैसे मालेगांव धमाकों के आरोपियों के हिंदू होने से इन्हे बड़ी तृप्ति हुई हो। जैसे इससे पहले कोई हिंदू आतंकवादी ही न रहा हो। जैसे स्टेन्स के हत्यारे, गुजरात दंगों के अपराधी, उड़ीसा के दंगाई, सभी संत रहे हों। ये बदले की वही पुरानी मानसिकता है जिसके तहत अयोध्या में ढांचा तोडा गया था, जिसके तहत सिख मारे गए थे, जिसके तहत देश भर में आतंवादी घटनाएँ हो रही हैं, जिसके तहत उड़ीसा में ईसाई जलाये जा रहे हैं और जिसके तहत गुजरात में नरसंहार हुआ था।
विश्वास न हो तो बशीर बद्र से पूछ लीजिये वो बताएँगे कि अगर मुसलमानों ने बम विस्फोटों में लोगो को मारा और अब हिंदू उसका बदला ले रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है। (अभी अयोध्या मामलें में उन्होंने ऐसे ही तर्क दिए थे।)। जिस देश में समाज को दिशा देने वाले साहित्यकार ऐसी सोच रखने वाले हो जाएँ उस समाज में त्योहारों का मतलब ही क्या है। क्यों और कैसे स्वीकार करें हम इस दीवाली पर शुभकामनायें?

हम विघ्नसंतोषी नही हैं हम भी खुशी चाहते हैं पर सब गृहमंत्रियों को चयनात्मक तैश आने की बीमारी हो जाए। लोग घटनाओं को नियत चश्मों से देखने लग जायें तो क्या करें आख़िर?
मालेगांव धमाको के संदिग्ध आतंकवादी दोषी हैं या नही इसका फैसला अभी कोर्ट को करना है (जैसे बाकी धमाकों के संदिग्ध आतंकवादियों का ) पर इससे पहले समाज को यह तय करना है कि उसे आतिफ और प्रज्ञा चाहिए या कलाम और अमर्त्य सेन। बाटला हॉउस हो या मुंबई की एक अभागी बस सिर्फ़ पुलिस और मीडिया की कहानी पर यकीन करना है या तथ्यों को आने देने का इंतज़ार?

शिकायत  

Posted by निशा in ,

किया व्यापर दर्द का
दिया दर्द और हर बार दर्द ही तौला
फ़िर समेत कर सारी अधूरी हसरतें
पुराना सा एक म्यूज़ियम बना डाला।

बंद करली खिड़कियाँ सारी
डाल दिया दरवाजों पर ताला
कैद कर ढेर सारी पहचानी रोशनियाँ
एक गुमनाम अँधेरा बना डाला।

बनकर याद तुम्हारे दिल मे ही रही
तुमने ख़ुद अपने ही दिल को छला,
रोया मन जब भी तुम्हारा साथ देने को
मुस्कुराकर तुमने हर बार बेगाना बना डाला।

(ये कविता मैंने अपने ब्लॉग पर लिखी थी आज इसे यहाँ रख रही हूँ। जिन्होंने इसे वहां एक बार पढ़ लिया है उनसे दुबारा कष्ट देने के लिए क्षमा चाहूंगी।)

हम सब सुशील कुमार सिंह के साथ हैं  

Posted by roushan in

एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें मेंफंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठककी।
इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्टमौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोटडाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित कियागया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील कोइरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया। इस समितिका संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादकअवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेशशर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाटकाम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं।यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंहको परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है। दूसरेप्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति काप्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा।शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिलऔर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने कीसाजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेपकरने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधीकार्यवाही की जाएगी। बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडियासंस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने कीजरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसीब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंनेकहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है औरसमाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंनेसंबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपीलकी।भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय गया है जब वेब माध्यमों से जुड़ेलोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यहकिसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा हमला करने कामामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे। एकजुटता और संघर्ष की इसका कारगर इलाज है। विस्फोट डाट कामके संपादक संजय तिवारी ने कहा- ”पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों परआलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना कोस्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता कोउजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।लखनऊ सेफोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर चुके हैं।लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्किवन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग नेउत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भीसाजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइटके गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बातअलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है। बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज नेभोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गएफैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की औरइस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की। बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडियाके संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेबमाध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ाजाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकिउन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है।हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़ेलोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता केनाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। परउन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़तीजाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना कोसकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। बैठक में हिंदी ब्लागों के कईसंचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।पाठकों से अपीलः अगर आप भी कोई ब्लाग यावेबसाइट या वेब पोर्टल चलाते हैं और वेब पत्रकार संघर्ष समिति में शामिल होना चाहते हैं तोपर मेल करें। वेब माध्यमों से जुड़े लोगों का एक संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू कीजा चुकी है। आप सबकी भागीदारी का आह्वान है। लखनऊ की पुलिस दिल्ली पहुंची.लखनऊ, 24 अक्टूबर। दिल्लीके वरिष्ठ पत्रकार एक मीडिया वेबसाइट के प्रमोटर सुशील कुमार सिंह से पूछताछ के लिए लखनऊ की पुलिसदिल्ली भेजी गई है। हिन्दी और अंग्रेजी की एक वेबसाइट में प्रसारित कुछ अंशों को लेकर यहां के गोमतीनगर थानेमें शिकायत दर्ज कराई गई थी। जिसके बाद पुलिस की टीम सब इंस्पेक्टर राजीव सिंह के नेतृत्व में दिल्ली भेजीगई।मीडिया के कंटेन्ट को लेकर इस तरह की कार्रवाई यदाकदा ही होती है। किसी वेबसाइट को लेकर इस तरह कीकार्रवाई पहली बार होती नजर रही है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को लेकर समय-समय पर नियम-कानूनकी बात होती रही है पर वेबसाइट को लेकर पुलिस की तत्परता पहली बार नजर रही है। खासबात यह है किभारत में अभी वेबसाइट को लेकर कोई नियम-कायदे बने ही नहीं है। इसके अलावा इस मामले में जिन अंशों कीचर्चा की रही है, उसमें किसी का नाम तक नहीं है। पत्रकार सुशील कुमार सिंह जनसत्ता, एनडीटीवी और सहारान्यूज चैनल से जुड़े रहे हैं। दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने इस सिलसिले में सुशील कुमार सिंह को पूछताछ के लिएअलग जगह पर बुलाया। इस पूरे मामले की जनकारी पुलिस के आला अफसरों को भी नहीं थी। इंडियन फेडरेशनऑफ वर्किग जर्नलिस्ट के अध्यक्ष के विक्रम राव ने इस प्रकरण को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा-कंटेन्ट कामामला जब मीडिया से जुड़ा हो तो ऐसे मामलों में पुलिस का हस्तक्षेप उचित नहीं है। ऐसे मामलों को बातचीत केजरिए ही सुलङाया सकता है। गोमतीनगर थाने के एसओ रूद्र कुमार सिंह ने इस मामले की पुष्टि करते हुए कहाकि सुशील कुमार सिंह के खिलाफ यहां शिकायत दर्ज कराई गई थी जिसकी विवेचना के लिए पुलिस दिल्ली भेजीगई है। इस मामले की जनकारी मिलने के बाद लखनऊ के कुछ पत्रकारों ने पुलिस और प्रशासन के आला अफसरोंको पूरी जनकारी दी और हस्तक्षेप करने को कहा ताकि बेवजह किसी का उत्पीड़न किया सके। गौरतलब हैकि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफतत्कालीन एसपी ने सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसेगिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था।इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यहमामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली।जानकारी के मुताबिक संबंधित वेबसाइट के गपशपजसे कालम को लेकर यह शिकायत दर्ज कराई गई। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्रनहीं किया गया है। पत्रकार सुशील कुमार सिंह ने कहा-यह अद्भुत मामला है। जहां किसी का नाम भी हो, वहशिकायत दर्ज करा दे और पुलिस पूरी तत्परता से वेबसाइट की जंच-पड़ताल करने निकल पड़े।http://aloktomar.com/ तथा http://khabriadda.blogspot.com/ से साभार
aloktomar@hotmail.com