आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन है सुभाष चन्द्र बोस उन दो बंगाली विभूतियों में से रहे हैं जिनके व्यक्तित्व और विचारों ने हमेशा से हमें प्रभावित किया है।
1897 में कटक जन्मे सुभाष बाबू अपने 14 भाई बहनों में नौवें थे। पिता के दबाव के चलते आई सी एस की कठिन और प्रतिष्टापूर्ण परीक्षा महज आठ महीनों के श्रम से उत्तीर्ण करने वाले सुभाष बाबू को देश की आजादी के लिए संघर्ष का रास्ता पसंद था और उन्होंने बिना किसी हिचक के आई सी एस से त्यागपत्र दे दिया। 1922 में स्वराज पार्टी के बैनर तले कलकत्ता के महापौर बने देशबंधु चितरंजन दास ने उन्हें नगर पालिका का मुख्यकार्यकारी नियुक्त किया। सुभाष बाबू की प्रशासनिक क्षमता और राष्ट्रीय सरोकार उनके कार्यकाल में नगर पालिका की कार्यप्रणाली में स्पष्ट देखा जा सकता है । बाद में सुभाष बाबू ख़ुद भी महापौर बने। बाद में अपने कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यकाल में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में राष्टीय योजना समिति की स्थापना की । इसी विचार का प्रतिनिधित्व आजादी के बाद बने योजना आयोग ने किया । इसी के साथ उन्होंने एक विज्ञान परिषद् की भी स्थापना की थी।
सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अन्दर पूर्ण स्वराज के संकल्प को लेकर जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर युवाओं का नेतृत्व किया। युवा नेताओं का यह समूह समाजवादी विचारों से प्रेरित था और भारत को एक प्रगतिशील रूढियों से मुक्त देश के रूप में देखना चाहता था। उनके व उनके साथियों के समाजवादी विचारों का कांग्रेस के अन्दर का दक्षिणपंथी समूह पसंद नही करता था । अपनी बीमारी के समय यूरोप प्रवास में उन्होंने विट्ठल भाई पटेल के साथ काम किया. कांग्रेस के उस समय के नेतृत्व से असंतुष्ट इन नेताओं ने बोस -पटेल विश्लेषण में अपने विचारों को स्पष्ट रूप से रखा. अपनी अस्वस्थता के दौरान नेताजी द्वारा की गई सेवा और उनके विचारों के चलते विट्ठल भाई ने अपनी संपत्ति वसीयत वसीयत द्वारा सुभाषबाबू के नाम करदी। विट्ठल भाई के छोटे भाई इस वसीयत से अप्रसन्न थे और उन्होंने मुक़दमे में सुभाषबाबू को पराजित करके विट्ठल भाई की संपत्ति प्राप्त कर ली परन्तु इससे दोनों महत्वपूर्ण और बड़े नेताओं में कटुता आ गई। वस्तुतः पटेल कांग्रेस के दक्षिणपंथी माने जाने वाले नेताओं में से थे और कांग्रेस संगठन पर महत्वपूर्ण प्रभाव रखते थे (आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में उन्होंने जवाहरलाल के उम्मीदवार के विरुद्ध अपनी शक्ति का प्रदर्शन भी किया था )। गांधी जी की खुली असहमति के बावजूद सुभाष बाबू कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीतने में सफल रहे। इसपर कांग्रेस कार्यसमिति के 14 में से 12 सदस्यों ने कार्यसमिति से इस्तीफा दे दिया (सिर्फ़ जवाहरलाल और शरत चन्द्र बोस कार्यसमिति में बने रहे थे। ) कार्यसमिति के विरोध के चलते उन्हें त्यागपत्र देना पडा।
नेता जी इस समय अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का लाभ उठा कर भारत को आजादी दिलाने के लिए एक बड़े संघर्ष का आगाज करने के पक्षधर थे परन्तु अधिकतर नेता इस मौके पर सावधानी पूर्ण कदम उठाने के इच्छुक थे।
इसी समय नेताजी और उनके लंबे समय तक साथी रहे जवाहरलाल में भी मतभेद हो गए। जवाहरलाल मतभेदों के वैयक्तिकरण के ख़िलाफ़ थे। उन्होंने सुभाष को लिखा कि चाल इतनी तेज नही हो कि साथी पीछे छूट जाएँ। उन दोनों में मित्र और धुरी राष्ट्रों को लेकर भी मतभेद रहे।
विश्वयद्ध के दौरान सुभाष बाबू ने निष्क्रिय बने रहने से इनकार कर दिया और नजरबंदी से भाग निकले । अफगानिस्तान, रूस होते हुए जर्मनी पहुँच कर उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संगठन की स्थापना की । इस दौरान उन्होंने जियाउद्दीन खान और ओरलान्दो मात्सूता नामों से यात्रा की। जर्मनी में हिटलर से मतभेदों और उससे मिली निराशा के चलते वो जापान गए और वहाँ पर आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला । उन्होंने आजाद हिंद की अंतरिम सरकार का भी गठन किया जिसे धुरी राष्ट्रों से मान्यता मिली थी।
आजाद हिंद फौज जापान के सहयोग से भारत की आजादी के लिए संघर्ष छेड़ दिया । अपने मतभेदों को किनारे करते हुए नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो के माध्यम से गांधी जी को संबोधित करते हुए जापान के सहयोग से भारत को आजाद कराने की अपनी योजना के बारे में बताया। यह वही संबोधन है जिसमे उन्होंने गांधी जी को राष्ट्र पिता कह कर पुकारा (यह उपाधि नेता जी की ही दी हुई है और गांधी जी ने सुभाष को नेता जी की उपाधि दी थी। )। हालांकि नेता जी की योजनायें भारत में पहले ही पहुँच रही थी और गांधी जी के नेतृत्व में एक तबका महसूस कर रहा था कि जापानियों का आगमन भारत के लिए बेहतर हो सकता है।
शुरूआती सफलताओं (जिसमें अंडमान निकोबार को जीतना शामिल था ) के बाद मित्र राष्ट्र भारी पड़ने लगे और आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पडा। 18 अगस्त 1945 का नेता जी की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। यह दुर्घटना और मृत्यु आज भी रहस्यपूर्ण है ।
आज हमारे लिए बहुत आसान है यह सोचना कि शायद जापानियों की जीत और उनका ताकतवर होना भारत की आजादी के लिए घातक हो सकता था , या फ़िर जापानियों या धुरी राष्ट्रों की मदद लेना ग़लत हो सकता था पर उस समय की परिस्थितियों की देखें तो धुरी राष्ट्रों के उफान के एक समय इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़ कर सभी जापान और आजाद हिंद फौज के बढ़ते क़दमों को लेकर आशान्वित थे। उस समय के तमाम नेताओं ने अपने हिसाब से चीजों को समझने की कोशिश की और उन्हें जो बेहतर समझ में आया किया । आज यह कहना आसान हो सकता है कि सुभाष ग़लत रास्ते पर निकल चुके थे या गाँधी अनुचित आग्रह कर रहे थे या भगत सिंह और उनके साथी अपनी हिंसा में ग़लत थे, पर हमें लगता है कि यह सभी एक दूसरे के पूरक थे। युवाओं में आत्म बलिदान के उच्च आदर्श जहाँ भगत सिंह और उनके साथियों से मिल रहे थे वहीँ गांधी ने आजादी की लड़ाई को आम आदमी तक पहुँचाया और उसे उससे जोड़ा । सुभाष ने 1857 के विद्रोह की टूटी कड़ी को जोड़ते हुए एक पूरी पूरी सेना का न सिर्फ़ गठन किया बल्कि अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों में जुडाव की एक भावना भरी। इसका प्रमाण था कि आजाद हिंद फौज के ट्रायल के समय उनके समर्थन में हो रही सभाओं में सैनिक वर्दी में शामिल हो रहे थे।
आख़िर सेना ही तो अंग्रेजों का अन्तिम दुर्ग था! सुभाष की सफलता की कहानी अंडमान और निकोबार जीतने या सेना गठित करने में नही थी। उनकी सफलता यहाँ हिन्दुस्तान में उस भावना की थी जो उन्होंने जगाई थी । उनकी सफलता उन तमाम आजाद हिंद सैनिकों में थी जो अंग्रेजो द्वारा बंदी बना कर लाये गए थे और उनपर मुक़दमे चल रहे थे। वो लाये थे अपने साथ अदम्य इच्छशक्ति की वो कहानियाँ जो नौसेना के विद्रोह के साथ मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य के ताबूत में अन्तिम कील साबित हुयी।
सुभाष बचपन से हमारे आदर्शों में रहे हैं। समय के साथ इतिहास के अलग अलग विन्दुओं के अध्ययन में हमने उनकी कमियों और भूलों को भी देखा और समझा इसके बावजूद उनका स्थान अभी भी वही है जहाँ तब था जब उनके साहसिक व्यक्तित्व को पहली बार जाना था।
महान लोगों की गलतियों और कमियों के बारे में जानना जरूरी है यह कहने के लिए नही कि ओह यह ऐसे निकले, उन्हें गाली देने के लिए भी नही, बल्कि यह समझने के लिए कि हम उनसे सीख लें यह समझने के लिए कि आख़िर वो इंसान थे ।
सुभाष से जुड़ी हुई यह कविता हमने छठी या सातवी में पढ़ी थी तब से याद है और आजभी ह्रदय मेंउत्साह का संचार करती है
ख़ूनी हस्ताक्षर
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन, न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है!
उस दिन लोगों ने सही-सही, खूं की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी।
बोले, स्वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा।
आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी।
आजादी का इतिहास कहीं काली स्याही लिख पाती है
इसको लिखने के लिए खूनकी नदी बहाई जाती है।
ये कहते-कहते वक्ता की, ऑंखें में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया!
आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले,”रक्त मुझे देना।
इसके बदले भारत की, आज़ादी तुम मुझसे लेना।”
हो गई उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इनकलाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे।
“हम देंगे-देंगे खून”, शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े, तैयार दिखाई देते थे।
बोले सुभाष,” इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, कौन यहॉं, आकर हस्ताक्षर करता है?
इसको भरनेवाले जन को, सर्वस्व-समर्पण करना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है।
पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!
वह आगे आए जिसके तन में, भारतीय ख़ूँ बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को, हिंदुस्तानी कहता हो!
वह आगे आए, जो इस पर, खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो!”
सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढ़ाते हैं!
साहस से बढ़े युबक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे!
चाकू-छुरी कटारियों से, वे अपना रक्त गिराते थे!
फिर उस रक्त की स्याही में, वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे!
उस दिन तारों ने देखा था, हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिखा था रणवीरों ने, ख़ूँ से अपना इतिहास नया।
खामोशियाँ!
कुछ कह जातीं हैं हमेशा
जानते थे हम
इसलिए उस दिन अचानक
जब वो मिला
तो बोलते रहे हम
दुनिया भर की बातें,
बेकार की बातें।
वो ख़ामोश रहा
बस सुनता रहा
और फिर चला गया
बिना कुछ कहे
बस ख़ामोशी ओढ़ कर।
और तब हमने जाना
कि ख़ामोशी सचमुच बोलती है।
भीतर तक छील गयीं
कई पुराने छुपे हुए से ज़ख़्म
फिर से खोल गयी
बचते रहे जिन बातों से हमेशा हम
उसकी ख़ामोशी
वो सबकुछ बोल गयी।
हमारी सपा महासचिव अमर सिंह जी से कोई निजी खुन्नस नही है पर उनसे बच के रहने की आप सब को सलाहदेंगे।
वजह?
हमारे गाँवों में किसी किसी का पैर बड़ा ख़तरनाक माना जाता है । लोग उनकी छाया से भी बचना चाहते हैं.
अगर आप इस पर भरोसा करते हैं तो यकीन मानिये आपको अमर सिंह से भी बच कर रहना चाहिए। जहाँ जहाँअमर सिंह जी की नजर पड़ी है वहाँ वहाँ घने से घने रिश्तों में भी दरार पर गई है।
गाँधी परिवार और बच्चन परिवार को ही लीजिये। बच्चन परिवार पर अमर सिंह की कृपादृष्टि क्या हुई इन दोनोंपरिवारों में खटास पैदा हो गई.
चलिए इस एक उदाहरण को और कारणों से हुआ मान लेते हैं ।
अमर सिंह का सपा में महत्त्व क्या बढ़ा और मुलायम सिंह से नजदीकी क्या बढ़ी कि बेनी प्रसाद वर्मा जैसे पुरानेसाथी मुलायम और सपा को छोड़ कर चलते बने। यही हाल राजबब्बर का भी हुआ। सपा में अनेक लोग अमर सिंहका रोना रोते आज भी मिल जायेंगे।
अनिल अंबानी और अमर सिंह में निकटता हुई और अंबानी बंधुओं में दरार पड़ गई । ऐसी दरार कि अंबानी समूहका विभाजन हो गया और अब उनमे कारपोरेट युद्ध छिड़ा हुआ है। सपा ने केन्द्र सरकार को समर्थन क्या दियामुकेश अंबानी को प्रधानमन्त्री के दरबार तक गुहार लगानी पड़ गई।
ताजा किस्सा दत्त परिवार का है।
संजय दत्त को लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से सपा उम्मीदवार घोषित किया गया और अमर सिंह लगातार संजय दत्त केपक्ष में बोलते जा रहे हैं । कल तक जो परिवार हमेशा संजय दत्त के साथ खडा रहता था उसमे दरार पड़ गई औरभाई बहन को एक दूसरे से बात करने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है ।
ऐसे में आप सबको सलाह है कि अमर सिंह नाम की किसी भी सहायता से बच कर रहें ।
डॉक्टर अनुराग आर्य के ब्लॉग से एक शिकायत रहती है । उनके ब्लॉग का नाम तो दिल की बात है पर उनके ब्लॉग को पढने के बाद अक्सर दिमाग का इस्तेमाल करना पड़ जाता है। वैसे उनके बारे में भी एक ख़ास बात है - उन्होंने एक बार कॉफी पीते-पीते कन्फेस किया था कि एक किताब को पढने के बाद उन्हें रात भर नींद नही आई थी (ज्यादा कॉफी पीने पर नींद आती है भला?)। हमें शक है तब से वो दिन में डाक्टरी करते हैं और रात में चाँद पर रिसर्च (शायद गुलज़ार के मार्गदर्शन में ) ।
खैर उनकी रिसर्च हमारी गुफ्तगू का विषय नही है । उनके ब्लॉग पर पिछली पोस्ट ख़ुदा की उम्र को लेकर एक सवाल उठाती है। हम पोस्ट पढ़ते गए और तय करते गए कि टिप्पणी देते समय क्या क्या लिखना है अंत में पहुँचकर एक सवाल सामने आ गया
"वैसे ख़ुदा की उम्र क्या होगी तकरीबन ?"
और हम अटक गए ।
डॉक्टर साहब तो सवाल उछाल कर फ़िर से डाक्टरी और चाँद पर रिसर्च में मशगूल हो गए और हम सोचते रहे।जितना ख़ुदा ने दिमाग दिया उससे ज्यादा खर्च डाला ।
सबसे पहले तो हमें याद आई राग दरबारी की । हमारे लखनऊ से ही ताल्लुक रखते हैं श्रीलाल शुक्ल साहब , रोज आते-जाते उनका घर देखते हैं और राग दरबारी को याद करते हैं। राग दरबारी में एक जगह वो पैगम्बरों की असलियत भी ज़ाहिर करते हैं। अब पैगम्बर इतने ज्यादा हैं कि चाह कर भी हम सब के बारे में शुरुआत नही मालूम कर सकते हैं सो पैगम्बरों के सहारे ख़ुदा तक पहुँचने का ख़याल छोड़ देना पड़ा।
ख़ुदा की उम्र जानने से पहले उस तक पहुंचना जरूरी है । तो पहले वही सही !
एक आम धारणा है कि खुदा जन्नत में रहता है और जन्नत की असलियत गालिब अपने साथ लेकर जन्नत चले गए और हमें बस ये दुहराने को छोड़ गए कि
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत फ़िर भी
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख़याल अच्छा है।
जन्नत की हकीकत को लेकर हमें बड़ा शक बना रहता है । कुछ न कुछ उस हकीकत में ऐसा जरूर रहा होगा कि गालिब ने शराब में ख़ुद को डुबो डाला । ऐसा भी हो सकता है कि जन्नत की हकीकत में बस इतना भर रहा हो कि वहाँ शराब पीना निहायत ज़रूरी हो और गालिब दिन-ओ-रात पीने की प्रैक्टिस करते रहे हों उम्र भर।
हमें तो मरने और जन्नत(उसमे अगर शराब पीना पड़े तो ) दोनों के नाम से बहुत डर लगता है।
कुछ लोग ऐसा नही मानते कि ख़ुदा जन्नत में रहता है। गौर फ़रमाइए
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता दे जहाँ पर खुदा न हो।
इन लाइनों से दो चीजें शीशे की तरह साफ़ हो जाती हैं । अव्वल तो ख़ुदा को बताया जाता है कि वो मस्जिद में रहता है दूजे वो मस्जिद के इतर भी कई जगहों पर देखा गया था तभी तो शायर बड़े ठसक से कह रहा है कि या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो? अब लोगबाग परेशान हो गए होंगे कि अभी इससे बोले कि तुम अमूक जगह पर जा कर पियो और क्या पता वही ख़ुदा भी मिल जाय! न जाने क्यों ये लोग ख़ुदा के पास शराब पहुँचने भी नही देना चाहते । अरे भाई उसकी मर्जी पिए न पीए आप शराबी को उसके पास बैठ कर पीने से रोक दोगे तो क्या ख़ुदा बच जायेगा? शराब जिसको पीना हो वो पी ही लेगा भले वो खुदा ही क्यों न हो।
खैर! ऐसा लगता है कि जैसे इंसान ख़ुदा को प्यारा होकर जन्नत चला जाता है वैसे ही ख़ुदा कभी जमीन की किसी चीज को प्यारा होकर जमीन पर आ गया। अब हुआ ये होगा कि पहले तो मस्जिद में किसी चीज को प्यारा हुआ होगा और उसका जमीन पर पहला ठिकाना मस्जिद रहा होगा फ़िर वो अलग अलग चीजों को प्यारा होते हुए अलग-अलग जगह पर भटकता फ़िर रहा होगा और अब किसी को पता नही है कि आख़िर ख़ुदा अब है कहाँ ।
ख़ुदा को खोजने निकलना तो हमारे बस की बात थी नही हम फ़िर से इधर-उधर देखने लगे तो दो चीजें फ़िर मिलीं
न था कुछ तो ख़ुदा था
कुछ न होता तो ख़ुदा होता।
इस बात पर यकीन करें तो ख़ुदा के होने में दो बातें हैं पहली कि जब कुछ नही था तब ख़ुदा था, दूसरी कि कुछ नही होता तो ख़ुदा होता । मतलब ये है कि अब तो बहुत कुछ है- ब्लॉग है , इन्टरनेट है कंप्यूटर है , उंगलियाँ हैं (बहुत कुछ है ) तो फ़िर अब ख़ुदा नही है? ये कैसी बात हुई कहीं और देखते हैं।
एक और लाइन है, अच्छी है-
हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है, हम हैं तो ख़ुदा भी है।
इसका मतलब ये हुआ कि अकबर इलाहाबादी साहब जब तक थे तबतक ख़ुदा था । और अब जब वो नही रहे तो ख़ुदा भी नही रहा !
ख़ुदा खैर करे ये क्या गजब है ।
हमने कहा था न कि दिल की बात पढने के बाद दिमाग का इस्तेमाल करना होता है सो हमने किया। अब शायर वगैरह जो बातें कहते हैं वो सिर्फ़ उनपर ही लागू नही होती वो सबपर लागू होती है अर्थात वो हमपर भी लागू होतीहैं॥ इसका सीधा मतलब हुआ कि जबतक हम हैं तबतक ख़ुदा है और जबसे हम हैं तबसे ख़ुदा है (उसके पहले थाया नही और होगा या नही हमसे क्या मतलब )
तो ख़ुदा की उम्र जोड़ते हैं, 1980 से 2008 - अट्ठाईस साल फ़िर एक अप्रैल, 2008 से एक जनवरी, 2009 - नौमहीने और 1 जनवरी से 11 जनवरी- 10 दिन ।
आज दिनांक 11 जनवरी 2009 को ख़ुदा की उम्र अट्ठाईस साल 9 महीने और 10 दिन है । एक अप्रैल को वो 29 साल का हो जायेगा।
जिन साहेबान को कोई ओब्जेक्शन हो वो अकबर इलाहाबादी साहब से संपर्क करें जिन्हें ख़ुदा को गिफ्ट-विफ्ट देना हो वो हमसे ।
ब्लॉग = चिटठा
ब्लॉगर = चिट्ठाकार
इन्टरनेट = अंतरजाल
जब भी कोई भाषा ऐसी चीज का प्रयोग करना शुरू करती है जिसकी शुरुआत किसी अन्य भाषा में हुई हो तो उसकेसामने ऐसी परिस्थिति आती है कि शब्दावली का क्या किया जाय। किसी भी भाषा ऐसे तमाम लोग होते हैं जिन्हेंमहसूस होता है कि किसी दूसरी भाषा की शब्दावली का प्रयोग करना यह मान लेना है कि हमारी भाषा उससेकमतर है। पर क्या ऐसा सच भी होता है?
उदहारण लेते हैं विश्व की सबसे लोकप्रिय भाषा अंग्रेजी से ;
अंग्रेजी में सबसे प्रमाणिक माने वाले शब्दकोष ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में हर वर्ष अनेको शब्द जोड़े जाते हैंउनमे से अधिकतर शब्द ऐसे होते हैं जो किसी न किसी अन्य भाषा से उधार लिए गए होते हैं और अंग्रेजी बोलनेवाले अनेक लोग उनका प्रयोग कर रहे होते हैं । ऑक्सफोर्ड में जोड़े जाने के बाद उन शब्दों के प्रयोग को एकवैधानिकता सी मिल जाती है और अंग्रेजी का शब्दकोष और लोकप्रियता बढती रहती है।
फर्ज कीजिये आप अंग्रेजी में लिख रहे हैं और कहीं पर आपको पान लिखना हुआ । आप बीटल लीव्स का प्रयोग करसकते हैं पर उससे पान का सही मतलब ज़ाहिर नही हो सकता । दूसरा तरीका है कि आप पान ही लिखें । जो पानसे अपरिचित हैं उन्हें बीटल लीव्स और पान दोनों के मायने देखने होंगे कि आख़िर बीटल लीफ या पान खाने केमायने क्या हैं पर जो पान से परिचित हैं उन्हें ज्यादा समझ पान लिखने से ही आएगा।
हमारा कहने का आशय है कि कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो अपने साथ साथ एक बड़ा सन्दर्भ साथ लेकर चलते हैं आनेजैसे ही उनका अनुवाद किया वो सन्दर्भ से कट जाते हैं और कमोबेश अर्थहीन हो जाते हैं। हमने विदेशियों से जबभी कभी बात की , इस बात का ध्यान रखा कि सन्दर्भ साथ लेकर चलने वाले शब्द अपरिवर्तित रहें उनके मायनेसमझा दिए जाय। यह श्रमसाध्य हो सकता है परन्तु एक गहरा संदेश साथ लेकर चलता है।
शब्दों को उनके मूल में ही रहने देना उर्दू में भी ख़ूब रहा है। वस्तुतः उर्दू का जन्म लश्करों में हुआ और इस भाषा नेकई भाषाओँ के शब्दों का जस के तस् प्रयोग करना जारी रखा । यही कारण है कि उर्दू जहाँ भी गई लोगों में गहरे सेपैठ गई।
यहाँ इस पूरी बहस का उद्देश्य यही रहा कि किसी ने हमसे पूछा कि यह चिट्ठा कैसा बेतुका सा नाम है पहली नजरमें तो यह नकारात्मक सा नजर आता है ।
हमें भी महसूस होता रहा है कि जब हम बस, ट्रेन, कंप्यूटर, आदि न जाने कितने शब्दों के लिए हिन्दी शब्द खोजनेऔर बनाने के चक्कर में नही पड़े तो ब्लॉग, ब्लोगर, और इन्टरनेट के लिए ऐसा करने की क्या ख़ास जरुरत है? हिन्दी बढेगी तो अपनी जीवन्तता से न कि शुद्धता के अनावश्यक आग्रह से।
हमारा मानना है कि जीवन्तता में लेन-देन का भी काफ़ी महत्त्व होता है ।
वैसे ये हमारा अपना विचार है आख़िर जो ऊपर लिखे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं उन्होंने भी तो कुछ सार्थक ही सोचाहोगा !

यह सवाल हमारे मन में उठा एक कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक मित्र के एक कथन से।
हमारे एक मित्र ने उन्हें सुझाव दिया कि एक जगह पर राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का प्रयोग किया जाय। उन्हें इस बात पर आपत्ति थी। उनका कहना हुआ कि राष्ट्रीय ध्वज में भगवा रंग उन्हें नही पसंद है इससे साम्प्रदायिकता की झलक मिलती है। यह सोच हमें अचंभित कर गई।
हम इस बात के पक्ष में नही रहते कि किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रीय चिन्हों का सम्मान करना जरूरी है देशभक्त होने के लिए। हमारा मानना है कि देशभक्ति राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान पर निर्भर नही करती बल्कि यह तो व्यक्ति की सोच पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान और उनके प्रति प्रेम दिखने वाले कई लोग अपने कृत्यों से वस्तुतः राष्ट्रविरोधी होते हैं और इन बातों को महत्त्व न देने वाले कई लोग अपने कृत्यों से राष्ट्रभक्त होते हैं।
हमें उन मित्र की राष्ट्रीय ध्वज सम्बन्धी सोच पर ऐतराज न होता अगर उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को साम्प्रदायिक बताने की अपनी सोच के पीछे कारण सिर्फ़ उसमे भगवा रंग का होना न बताया होता । तब ये सिर्फ़ उनकी सोच होती जो किसी के लिए सही और किसी के लिए ग़लत होती अगर वो भगवे के साथ हरे रंग का भी जिक्र कर देते ।
अगर भगवा रंग साम्प्रदायिकता की झलक है तो हरा रंग इससे अछूता कैसे है? यह सिर्फ़ अंध हिंदू विरोध का प्रमाण है कि उन्होंने सिर्फ़ भगवा रंग का जिक्र किया । सच तो यह है कि अगर कट्टरपंथी हिंदू धर्म में हैं तो और धर्मों में भी हैं। जितनी आलोचना हिंदू कट्टरपंथियों की होनी चाहिए उतनी ही और मजहबों के कट्टरपंथियों की भी। इस तरह की एकतरफा सोच रखने वाले कट्टरपंथियों से भी अधिक भ्रमित होते हैं और निंदनीय होते हैं।
वस्तुतः हिन्दी में भगवा और केसरिया अलग अलग अर्थों के लिए प्रयोग किए जाते हैं । भगवा रंग जहाँ सांप्रदायिक अर्थों के लिए प्रयोग किया जाता है वहीँ केसरिया बलिदानी भावना के लिए प्रयोग किया जाता है और हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रंगों के लिए केसरिया ही प्रयोग में आता है। केसरिया और भगवे में कोई अन्तर रंग का होता है या नही हमें नही पता पर भावनाओं का अन्तर जरूर होता है और इस अर्थ में हरा रंग ज्यादा सांप्रदायिक हो सकता है उन लोगों के लिए जो रंगों को साम्प्रदायिकता से जोड़ते हैं।
बहरहाल ऐसी सोचें राष्ट्रीय ध्वज के विकास की प्रक्रिया की जानकारी के अभाव के चलते होती है या फ़िर किसी एकमानसिकता में इतना रंग जाने पर कि और रंग दिखाई ही न पड़ें ।
एक दिन कभी
शायद हम फिर मिलें
जीवन के किसी मोड़ पर
यूँ ही भटकते हुए
तब शायद हम ढोंग करें
एक-दूसरे को न जानने का।
या फिर हम पहचान लें
और थोड़ा मुस्कुरा कर कहें
“अच्छा लगा तुमसे मिलकर”
और कर के कुछ इधर-उधर क़ी बातें
अचानक कोई ज़रूरी काम याद आने की बात कहकर
थोड़ा और मुस्कुराएंगे
और अलग होंगें कह कर
फिर से मिलने क़ी उम्मीदों के बारें में ।
लेकिन ये सब कुछ
शुरू से ही झूठ होगा
धोखा होगा ख़ुद से ही
उस वक़्त हमे मिलना पसंद न आए शायद
भारी लगे मुस्कुराना,
दर्द दे बातें करना
और तो और
फिर से अलग होना भी परेशान करेगा
दिल रोएगा आँसू छिपा
फिर से अलग होने क़ी बेबसी से।
लेकिन कभी नही रहा
इतना समझदार ये दिल
ये फिर से मिलना चाहता है
बातें करना और मुस्कुराना चाहता है
ज़ख़्मों को फिर से खोल-खोल कर
फिर-फिर से रोना चाहता है।

