मौसमों का डाकिया  

Posted by roushan in ,

बादलों की उमंगें


तितलियों के रंग

नदियों की खिलखिलाहट

बारिशों की नज्में

बसंत की खुशबुएँ

और भी जाने कैसे कैसे

दिखाता रहा करिश्में

निकाल निकाल

अपनी जादुई पोटली से

जाते जाते मुस्कुराया शरारत से

वो मौसमों का डाकिया

और लिख गया मेरा नाम-पता

उदासियों के पार्सल पर

आप संघ के नही हैं तो आप सिमी के हैं?  

Posted by रूपाली मिश्रा in , ,

पिछले दिनों एक ब्लॉग पर उस ब्लॉग को लिखने वाले ने मुझे आमंत्रित किया अपना उपन्यास पढने के लिए। उस ब्लॉग पर पहुँचते ही मेरी नजर पड़ गई संघ की तारीफ़ में लिखे एक लेख पर। उक्त ब्लॉगर ने वह लेख एक अफलातून जी के संघ के ऊपर प्रहारों के विरोध में लिखा था। अफलातून जी ने शायद अपने लेख में संघ के नमूने की देशभक्ति को राष्ट्र के लिए घातक बताया था। मै उक्त ब्लॉगर और अफलातून जी के तर्कों की विवेचना कर पाती इससे पहले मेरी नजर पड़ गई उक्त ब्लॉगर द्वारा अपने लेख पर की गई टिप्पणी पर दिए गए जवाब पर. वो जवाब पढने के बाद मुझे मजबूरन बिना पढ़े ही अफलातून जी के तर्क सही लगने लगे.
उक्त ब्लॉगर के लेख पर किसी ने टिप्पणी की थी "क्या मै संघ का हूँ?"
और उस ब्लॉगर ने जवाब दिया
"तो क्या आप सिमी के हैं?"
जैसा कि मैंने बताया कि अफलातून जी ने संघ प्रकार की देशभक्ति को देश के लिए घातक बताया था।

एक संघ समर्थक का बुश की शैली में ये जवाब कि अगर आप हमारे साथ नही हैं तो आप दुश्मन के साथ हैं वास्तव में देश के लिए घातक ही है. और अगर संघ ऐसे ही सोचता है तो वह राष्ट्र के लिए घातक ही है.
क्या संघ अकेला देशभक्त संघटन है? क्या अब लोगो को अपनी देशभक्ति संघ से प्रमाणित करवाने की जरूरत पड़ने लगेगी? देश के लोगों को संघ और सिमी दो पालों में तोड़ देने वाले लोग किस तरह से राष्ट्रभक्त हो सकते हैं मुझे नही पता.
उस ब्लॉगर से मैंने उसकी इस गलती की चर्चा की तो पता चला कि वह महोदय उन बंद दिमाग लोगों में से हैं जिन्होंने सोचने समझने की शक्ति का कभी इस्तेमाल ही नही किया होगा. मेरी आपत्ति के जवाब में उन्होंने सीधे मुझे अफज़ल जैसे लोगो का हमदर्द बताना शुरू कर दिया. मेरे ये कहने पर कि मैंने अफज़ल का कभी समर्थन नही किया है उन्होंने मुझे कहा कि नही किया है तो करोगी. और गुप्त रूप से करती होगी.
मुझे याद आया उन चर्चाओं का कि कैसे अति राष्ट्रवादी अन्य सभी को हेय साबित करने के लिए ख़ुद की बनाई मान्यताओं का प्रयोग करते हैं.
मुझे याद आया कि इसी तरह हर मौके पर कैसे अन्य सभी को एक उस पाले में धकेलने की कोशिश की जाती है जिसमे वो कभी रहे ही नही और तब क्या ग़लत होता है जब इस तरह धकियाये लोगों में से कुछ सचमुच उस पाले में ख़ुद को खड़ा पाते हैं.
इसी तरह तो तोडा जाता है राष्ट्र को
इसी तरह से तो बनाया जाता है अविश्वास का वातावरण.
शायद वो उन्ही फलसफों पर बढ़ते हैं जो हिटलर जैसे लोगों ने खड़े किए थे

---जो आप से सहमत नही हैं उन्हें ख़त्म कर दो


फिलहाल मै जानती हूँ अपनी आस्था मुझे किसी के प्रमाणपत्र की जरुरत नही है देशभक्ति साबित करने के लिए। इस देश की होने के चलते मुझे हक़ है हर चीज में बोलने का, सवाल उठाने का और जवाब पाने का और मै समझती हूँ सभी को यह महसूस करना चाहिए, हिंदू हो या मुसलमान सभी को
विघटन कारी शक्तियों के मनसूबे तभी नेस्तनाबूत होंगे

चंद्रयान  

Posted by roushan in



भारत का प्रथम मानव रहित चन्द्र अभियान १९ अक्तूबर को अपनी अन्वेषण यात्रा पर रवाना होगा. वैज्ञानिकों ने भारतीय सपने को साकार करने के लिए तैयार चंद्रयान को लोगो के सामने पेश किया. 
भारतीय वैज्ञानिकों को इस अभियान के लिए शुभकामनाएं.. 
आशा है तमाम सफलताओं के क्रम को जारी रखते हुए चंद्रमा पर शीघ्र ही भारतीय ध्वज होगा

बंद चीजें  

Posted by roushan in

कान कसकर बंद करने भर से
सुनाई पड़ना बंद नही होता
चीज़ें दिखती रहती हैं
आँखें बंद कर लेने पर भी
और कुछ न कुछ बोल जातें हैं
सिले हुए होंठ भी.


हम बस ढोंग करते हैं
न देखने, न सुनने
या फिर न बोलने का
और मन को समझा कर
कोशिश करते हैं ख़ुश रहने की
अपनी दुनिया में
अपनी बनाई सीमाओं में.


पर शायद
सोचना बंद हो जाता होगा
दिमाग़ बंद कर लेने से
नही तो कैसे चलता व्यापार
नफ़रत के सौदागरों का

नाभिकीय कुहासा और भ्रम के साए  

Posted by निशा in

नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह में इस समय जम के जोड़ तोड़ चल रही है और वहीँ एक पत्र के खुलासे ने भारत में राजनीतिज्ञों को उत्तेजित कर रखा है। चलिए देखते हैं क्या है पत्र और क्या है उसके मतलब
गोपनीय पत्र
राष्ट्रपति बुश ने एक सांसद की एक प्रश्नावली के जवाब में ये पत्र जनवरी के आस-पास लिखा था उसमे उन्होंने भारत के परमाणु परिक्षण करने की दशा में अमेरिकी सरकार के संभावित क़दमों की चर्चा की है। पत्र में कई बातें हैं भारत को संवेदनशील तकनीकि न देने की भारत को आपूर्ति तुंरत रोकने की आदि आदि।
बवाल
बवाल यह है की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को गुमराह किया। अब सवाल ये उठता है की जो लोग आज ऐसी बातें कह रहे हैं क्या वो प्रधानमंत्री के बयानों का मतलब नही समझ रहे थे? धन्य हैं ये लोग जो सीधी बातें नही समझते हैं और इल्जाम दूसरों को देते हैं। प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट कहा था कि भारत को परमाणु परीक्षण का हक़ है और अमेरिका को प्रतिक्रिया का । और आप लोग क्या समझते हैं भारत को इस डील से परमाणु परीक्षण का हक़ मिलने जा रहा था? यह नागरिक समझौता है सैन्य नही । ये हमें समझना होगा।
1998 के परमाणु परीक्षण हमारी पीढी के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। उस समय हमें कई बातों का पता चला। सी टी बी टी क्या है , एन पी टी क्या है , भारत इन पर हस्ताक्षर क्यों नही करता आदि। उसी समय तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री ने भारत के तरफ़ से एकतरफा घोषणा की थी आगे परीक्षण न करने की। उस समय हमारे वैज्ञानिक समुदाय का सोचना था की अगर कोई बड़ा परिवर्तन नही आया तो हमें निकट भविष्य में परीक्षण करने की जरुरत नही होगी। जो आज शोरगुल कर रहे हैं उन्हें ये बताना होगा कि कौन सा ऐसा परिवर्तन आ गया है जिससे हमें परीक्षण करने कि जरुरत आ पड़ी है। उन्हें ये भी बताना होगा कि अगर ये डील नही होती है तब भी हमें परीक्षण करने पर प्रतिबन्ध झेलने पड़ेंगे तो फ़िर डील करके ही क्यों न झेलें । ऐसी वैज्ञानिक प्रगति किस काम की जिसका हम उपयोग ही न कर सकें ।
लोग शोर मचा रहे हैं कि सरकार अमेरिका को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। अगर ऐसा होता तो अब तक मामला नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह के पास लटका न होता सरकार ने बातें मान ली होती ।
हर बात में मीन मेख निकालने कि जगह अगर भाजपा जैसे समूहों ने सरकार को मदद कि पेशकश कि होती तो शायद वो अपनी छवि रचनात्मक बना पाते।
खैर अभी तो बात विएना में अटकी पड़ी है
देखिये क्या होता है
पर मेरी सलाह इन देशभक्तों को यही है कि देश हित सोचें पार्टी का हित अपने आप साध जाएगा ।

सोफ्टवेयर बाजार  

Posted by निशा in

सबसे पहले सभी लोगो को धन्वाद जिन्होंने हमारा पिछला पोस्ट पढ़ा और प्रतिक्रिया दी। लवली जी आपने ये पिछला पोस्ट निश्चित रूप से पढ़ा है हमारे ब्लॉग पर जिस पर अब हमने लिखना बंद कर दिया है। आपने वह भी प्रतिक्रिया दी थी इसलिए आपका ये लगना सही है की आपने इसे कहीं पढ़ा है। आपको एक ही चीज दो बार पढ़वाने के लिए माफ़ी चाहती हूँ।
पिछले दिनो मै दिल्ली में थी। उस समय एक दोस्त से मिलने गयी थी। नयी टेक्नालजी को पसंद करने वालो मे से एक रही है वो हमेशा से और जब मै उसे मिलने गयी तो वो अपने डेस्कटॉप से उलझी हुई थी. उसके साथ गुज़रे दो घंटे पूरे-पूरे कंप्यूटर के पास ही गुज़रे.वो माइक्रोसॉफ्ट का ऑपरेटिंग सिस्टम प्रयोग करती है और उस समय वो कुछ अपडेट तलाश रही थी.
मैने उसे ढेर सारी इधर उधर की वेबसाइट्स पर घूमते पाया मैने कहा कि तू सीधे माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर अपडेट क्यों नही देखती तो उसने बताया की ढेर सारे अपडेट्स के लिए माइक्रोसॉफ्ट प्रामाणिक ऑपरेटिंग सिस्टम चाहता है जो मेरे पास है नही, तो फिर इधर उधर से ही खोजना पड़ेगा।
उसके पास से तो मै चली आई पर सोचती रही। मुझे पता है कि पयरेटेड सॉफ्टवेर प्रयोग करने वालों कि संख्या अपार है और इससे सॉफ्टवेर बनाने वाली कंपनियों को बड़ा घटा होता है और इसीलिए ये कंपनियाँ अपडेट्स और सपोर्ट उन्ही को उपलब्ध करती हैं जो प्रामाणिक वर्ज़न प्रयोग करते हैं। पर आश्चर्य कि बात है कि इस समस्या से निपटने के लिए अभी तक कुछ ठोस किया नही गया है।
फर्ज़ कीजिए कि आपको एक कंप्यूटर खरीदना है। आप के पास दो विकल्प होंगे आप अस्म्बॅल्ड कंप्यूटर ले या फिर ब्रांडेड। अस्म्बॅल्ड में आसानी यह रहती है कि आप वो चीज़ें तय कर सकते है जो आपको चाहिए वो भी कम कीमतों में. फिलहाल दोनो तरीकों मे आपको सॉफ्टवेर प्रामाणिक लेने के लिए अच्छा ख़ासा पैसा ज़्यादा खर्च करना पड़ेगा. जैसे माइक्रोसॉफ्ट का एक्स पी लेने के लिए आपको कोई 6000 रुपये ज़्यादा चाहिए जब कि पयरटेड एक्स पी आपको अक्सर मुफ़्त मिल जाता है. अगर आपको खरीदना भी पड़े तो कीमत कोई 200-300 के आस पास बैठेगी. काम दोनो वैसे ही करते हैं. अपडेट्स भी कहीं ना कहीं से मिल ही जाते हैं. अब कौन भला ओरिजिनल के चक्कर में पड़े
जी हाँ मै जानती हूँ कि यह उचित नही है, यह चोरी है लेकिन 300 और 6000 में फ़र्क काफ़ी बड़ा होता है.मै भी नैतिकता के सवाल मे उलझी रही.
मैने सोचा किसी व्यावहारिक और नैतिक इंसान से बात कि जाए. अब कवि से बड़ा नैतिकता का पैरोकार कौन होता है. मैने रौशन से बात की.कवि लोग सीधी बाते करने में भरोसा नही रखते मैने आपसे पहले भी अर्ज़ किया था.
रौशन ने शुरुआत ऐसे ही की। उसने मुझसे दो बातों पर विचार करने को कहा.
पहली बात टी-सिरीज़ कंपनी का भारतीय संगीत व्यापार में योगदान और दूसरी बात भारतीय वित्त मंत्रालय की स्वेच्छिक आय घोषणा योजना.
मेरा नाराज़ होना स्वाभाविक था मैने उसे बताया की मै अभी कुछ नैतिक और टेक्नोलॉजिकल मुद्दो पर चर्चा चाहती हूँ.
वो बताता रहा इन दोनो के बारे में
शायद मेरा नाराज़ होना ग़लत था
उसका कहना था कि सॉफ्टवेर कि ऊँची क़ीमतें लोगो को पयरेसी कि ओर धकेल रही हैं। अगर माइक्रोसॉफ्ट अपने सॉफ्टवेर कि कीमतों में कमी करके उन्हे प्रासंगिक बनाता है तो शायद वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को ओरिजिनल सॉफ्टवेर खरीदने के लिए राज़ी कर पाएगा और इस तरह शायद उसका फयडा भी ज़्यादा हो.टी सिरीज़ और उसके बाद और संगीत कंपनियों का अनुभव बताता है कि फ़ायदा हो सकता है. कंपनियों को थोड़ा व्यावहारिक कदम उठाने होंगे.उसकी सोच है कि अगर कंपनियाँ पयरटेड सॉफ्टवेर प्रयोग करने वालों को थोड़ी कीमत में प्रामाणिक मान लें और उन्हे अपडेट्स ऑनलाइन उपलब्ध करने का फ़ायदा दिखाएँ तो बहुत से लोग अपने सॉफ्टवेर को प्रामाणिक बनाने के लिए कुछ पैसे खर्च करने को तैयार हो सकते हैं
वस्तुतः इस तरह कंपनियाँ उस उपभोक्ता से भी कुछ पा लेंगी जिससे उसे कुछ भी नही मिलना था, और उपभोक्ता भी कंपनियों से जुड़ सकेंगे।विचार अच्छा हो सकता हैआज जब कंप्यूटर लोगो कि ज़रूरत बनता जा रहा है तो सॉफ्टवेर कि ऊँची कीमते ना उपभोक्ताओं के हित में हैं ना ही उत्पादकों के हित में।
मुझे याद है कि मेरे अपने लॅपटॉप का ऑपरेटिंग सिस्टम लॅपटॉप के साथ मिला था अगर मुझे खरीदना होता तो शायद मै भी नैतिक ना रह पाती

आपका क्या कहना है

स्वार्थ!  

Posted by निशा in ,

(इस प्रसंग के पात्र काल्पनिक नही हैं और वास्तविक जिन्दगी से उनका गहरा रिश्ता है। ये प्रसंग दिमाग में ऑरकुट पर एक स्क्रैप देख कर उपजा है।)
नीलू ने झटके से स्कूटी रोक दी अब वो कहीं दूर देख रही थी।
-दी! वो रही आपकी पंखुडी ब्लू सूट में। उन लोगो का क्लास ख़त्म हो गया है मै आपको उससे मिलवा दूँ?
नही मैं मिल लूँगी तुझे लेट हो रही होगी।-
हाँ वो तो है। अच्छा अब मै चलती हूँ। ये स्कूटी यही खड़ी कर देना और मुझे टाइम पर लेने आ जाना।
नीलू उछलते कूदते चल पड़ी अपने क्लास की ओर और मै रुक कर देखने लगी।तो ये है पंखुड़ी। मैने सोचा। मै स्कूटी पर ही बैठी रही. अचानक मुझे डर लगने लगा. अनिमेष कि बातें याद आने लगी. उसके अपने अंदाज में उसने सोचते हुए कहा था. शायद अच्छी लगती है पता नही पर मै बात बढ़ाना नही चाहता इसीलिए मैने आजतक उससे बात तक नही की है. वो अनिमेष जिसे मै चाहती थी और सोचती थी की कभी ना कभी उसके भी दिल में मेरे लिए ऐसा ही कुछ जागेगा, किसी और के प्रति आकर्षित था और उसकी आँखें कहती थी की ये आकर्षण कुछ ज़्यादा ही है.
मै क्यों मिलना चाहती थी पंखुड़ी से ये तो मुझे नही पता था पर उसे देख कर ऐसा लग रहा था की मै अनिमेष को खो ही चुकी हूँ। कितनी स्वीट दिख रही थी वो. मैने स्कूटी के शीशे में खुद को देखा. आँख मे जलन के भाव थे और मुझे अपना चेहरा अच्छा नही लगा।
वो एक और लड़की के साथ थी और अब एक पेड़ के गोल चबूतरे पर आ के दोनो बैठ गयीं। मैने साहस बटोरा और उसकी तरफ बढ़ गयी।
-एक्सक्यूस मी ये थर्ड ईयर बॉटेनी की क्लास कहाँ होती है?
मैने सीधे उसी से पूछा वो जैसे किसी सोच में थी उसके साथ की लड़की ने एक तरफ इशारा किया मैने उस दिशा में देखा तक नही।
-आप किस क्लास की हैं?
-थर्ड ईयर बॉटेनी
फिर साथ वाली लड़की ही बोली मैं थोड़ा झिझकी
- ये अनिमेष आपके ही क्लास में है ना? वो चला गया क्या?
अनिमेष नाम सुनते ही जैसे उसके कान खड़े हो गये दोनो मुझे एकदम से देखने लगीं।
-आपको अनिमेष से मिलना है?
साथ वाली लड़की ही बोली
-हाँ वो मेरा पुराना क्लासमेट है मै यहाँ आई थी तो सोचा की उससे मिल लूँ।
दोनों अभी भी मुझे घूर सी रही थी लगभग पंखुड़ी की आँखे कह रही थी कि इसे अनिमेष से कुछ मतलब तो ज़रूर है मेरा डर एकदम से पुख़्ता हो गया।
तू तो गयी बेटा। ये लड़की ले जाएगी अनिमेष को तुझसे छीन कर।
दोनो ने एक दूसरे को देखा। पंखुड़ी अब कुछ असहज सी थी। साथ वाली लड़की ही बोली फिर से
-वो आज नही आया है। शायद कही गया है
-मतलब शहर मे नही है?
- शहर में होता है तो कॉलेज ज़रूर आता है पर वो कल भी नही आया था।
ये पंखुड़ी गूंगी है क्या
मैने मन में सोचा। अब और पूछने को कुछ नही था मै भी अधिक असहज हुई जा रही थी।
- अच्छा थॅंक्स मै चलती हूँ।
मैंने बेमन से कहा मै मुड़ने को ही हुई तो अचानक एक दूसरी आवाज़ सुनाई दी।
- आपके पास उसका नंबर होगा पूछ लीजिए शायद हो ही शहर में
-ओह तो आप बोलती भी हैं
मैने मन मे सोचा
- असल में बहुत दिनो से हम मिले नही हैं तो नंबर भी नही है कोई। अगर आप के पास हो तो। वो बुरा नही मानेगा असल मे खुश ही होगा हम बहुत पुराने दोस्त हैं।
दोनो फिर एकदुसरे को देखती रहीं
-प्लीज़ उसे मत बताइएगा कि हमने दिया है नंबर
पंखुड़ी झिझकते हुए बोली।
- आपने अपना नाम ही कहाँ बताया है जो मै उसे बता दूँगी कि आपने दिया है
मै मुस्कुराइ
- ओह मै पंखुड़ी और ये सोनाली
वो अपना बैग खोलते हुए बोली
- मतलब उसे बताना है कि नंबर पंखुड़ी और सोनाली ने दिया है
- ओह नही प्लीज़ मै तो आपको नाम बता रही थी उसे मत कहियेगा
उसका हाथ रुक गया और वो घबडा सी गयी
- ट्रस्ट मी वो बुरा नही मानेगा। लेकिन आप कह रहीं हैं तो मै उसे नही कहूँगी हाँ अगर आप लोग ही ना बता दें।
जिन लोगो ने कभी किसी को चाहा होगा वो जानते होंगे कि कब किसी का नाम सुनकर किसी के हाथ कापने लग जाते हैं कब और क्यों किसी के बारे में बात करने का मन भी करते है और बात हो भी नही पाती और कब किसी और के मूह से उसका नाम सुनकर और ये जान कर कि कोई और उसके बारे मे हमसे ज़्यादा जानता है दिल बेतहाशा धड़कने लगता है। मैने पंखुड़ी के सामने ही अनिमेष के घर फ़ोन किया मुझे पता था कि वो घर पर नही है पर पूछा और अपना संदेश छोड़ा। मुझे पता था कि अगर उसके मन मे अनिमेष के लिए कुछ होगा तो मुझे पता चल जाएगा। और पता चल गया। मै जान चुकी थी कि सिर्फ़ अनिमेष ही नही चाहता उसे बल्कि वो भी चाहती है अनिमेष को। मै उदास हो चली थी. मै जानती थी कि दोनो एक क्लास मे पढ़ते हैं और कभी ना कभी दोनो एक दूसरे कि फीलिंग्स जान ही जाएँगे और तब मै खो दूँगी अनिमेष को हमेशा के लिए. मै मनाती रही कि दोनो एक दूसरे से कुछ ना कह पाएँ. ये थर्ड ईयर है साल ख़त्म होते ही दोनो के लिंक्स टूट जाएँगे. काश!. मैने तय किया कि मै अनिमेष को अपनी रीडिंग नही बताने वाली. कहीं कोई अपना बुरा खुद करता है. क्या हुआ कि वो नही चाहता मुझे पर कल किसने देखा है.
कहते हैं कि कभी कभी आपकी ज़ुबान पर सरस्वती का वास होता है और आप जो भी कहते हैं सच हो जाता है. साल ख़त्म हो गया. दोनो एक दूसरे से कुछ नही कह पाए. और अलग हो गये. मै अक्सर अनिमेष से पंखुड़ी के बारे में पूछती रही और वो हंस के टालता रहा. पर जब आप किसी को सच्चे मन से चाहते हैं तो उसकी उदासी पढ़ सकते हैं. आज इतने दिनो बाद भी जब अनिमेष उसके बारे मे सुनकर हंस के टाल देता है तो मुझे अंदर से कुछ चुभता है कि मै दोनो कि फीलिंग्स जानती थी मै दोनो के लिए कुछ कर सकती थी पर मैने नही किया.मुझे सबसे बुरा तो तब लगा जब मैने ये पूरी बात अनिमेष को बताई. मै पढ़ सकती थी उसके मन में क्या है. पर उसने मुस्कुरा कर मुझे डांटा कि जबर्दस्ती मै आपने को दोषी क्यों मानती हूँ. वो मुझे समझना लगा कि वो खुद इस बात को वही पर रोकना चाहता था. कहते हैं कि सच्चा प्यार खुशी देता है स्वार्थी नही होता. जब स्वार्थ आ जाता है तो प्यार नही मिल पाता. सच मे नही मिला ना पंखुड़ी को ना अनिमेष को, खैर मुझे तो मिलना ही नही था

अभिनव ने जीता सोना  

Posted by roushan in ,

बिंद्रा ने जीता सोना !

निशाने बाज अभिनव बिंद्रा ने आज उस समय इतिहास रचा जब उन्होने भारत के लिए ओलिंपिक स्पर्धा की व्यक्तिगत श्रेणी मे पहला गोल्ड मेडल जीता।अभिनव ने ये मेडल १० मीटर एयर राइफ़ल स्पर्धा में जीता. उन्होने कुल ७००.५ अंको के साथ स्पर्धा मे पहला स्थान प्राप्त किया जबकि पूर्व ओलिंपिक गोल्ड मेडलिस्ट चीन के झू किनन दूसरे और फिनलॅंड के हकिनेन तीसरे स्थान पर रहे. अभिनव की इस उपलब्धि पर उन्हे बधाई।












हमारी भी बात  

Posted by निशा in

इस ब्लॉग पर हमारा ये पहला पोस्ट है। अपना ब्लॉग बंद करने के बाद रौशन का ब्लॉग हमारी पहली पसंद था और वैसे ही इस ब्लॉग के पास वर्ड्स हमारे पास पहले से ही थे. फिर भी उसे पूछना तो ज़रूरी ही था. तो पूछ लिया और उसे तो ना कहना ही नही था. सच तो है की वो ना तो कहता ही नही. वो ऐज यू विश बोल देता है और अगला मतलब निकालता रह जाए. हमने तो उसकी ऐज यू विश को हमेशा हा और चुप्पी को हमेशा ना न कहने की आदत के रूप मे जाना है।

हमारी ब्लॉग्स मे दिलचस्पी इधर थोड़े दिनो मे ज़्यादा बढ़ी है जब से हमने पाया कि देवनागरी में लिखना बड़ा आसान है. इधर कुछ और चीज़े हुईं जिन्होने काफ़ी काम आसान कर दिया. जैसे गूगल पर डॉक्युमेंट्स साझा करने कि सुविधा, क्विलपॅड और ब्लॉगर जैसी साइट्स पर हिन्दी टाइपिंग कि सुविधा और बढ़ता हुआ इंटरनेट का जाल. हमे याद है कि सालों पहले दिल्ली में साइबर केफे में रेट्स काफ़ी ज़्यादा हुआ करते थे अब ये लोगों कि पहुँच मे ज़्यादा आ रहे हैं. इंटरनेट कि वजह से सिटिज़न जर्नलिस्ट जैसे कॉन्सेप्ट भी बड़े लोकप्रिय हो रहे हैं और पढ़ने, बात करने और समझने के ज़्यादा अवसर मिल रहे हैं.

लब्बोलुआब यह है कि दुनिया छोटी हो के मुट्ठी मे आ रही है। लोग-बाग ब्लॉग्स में बहुत कुछ लिख रहे हैं. हमने देखा कि कविताओं, निजी डायरियों और अनुभवों की भरमार है. ये उन लोगों के हैं जो इंटरनेट कि वजह से अपने मन कि बात कह पाने मे ज़्यादा सक्षम हैं. समझ का एक विस्तार सा चल रहा है

ऐसे में हम क्या लिखें? कहने को तो बहुत कुछ या पर क्या सब कुछ कहा जा सकता है? वो ग़ालिब ने कहा है न


किसी को देके दिल कोई नवासंगे फुगा क्यों हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मूह में ज़ुबाँ क्यों हो


हम भी ग़ालिब की इज़्ज़त करते हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नही कि सामने मौका और उंगलियों तले की बोर्ड हो और हम चूक जाएँ। अब हम कोई कवि तो हैं नही.आप बोलेंगे कि कवि तो बोलता है, कहता है और लिखता हैयही तो ग़लत फ़हमी है ये जो कवि और शायर वग़ैरह होते हैं ये बड़े गोल मोल टाइप के इंसान होते हैं. बातों को घुमा कर लोगो को गोल गोल घमाने में इनका कोई सानी नही. ये कोई बात इसलिए लिखते हैं कि कोई और बात छुपानी होती है.तो इस ब्लॉग में हमारे सहभागी रौशन के उलट हम जो कुछ लिखेंगे सच लिखेंगे, सच्ची जिंदगी से लिखेंगे और कविता तो बिल्कुल नही करेंगे. और इसका उदाहरण है अगला पोस्ट जो एक प्रसंग है और हमारे ब्लॉग पर था उसे हम यहाँ ले कर आ रहे हैं।

बाकी जल्दी ही

कच्ची उम्र के कच्चे आम  

Posted by roushan in

आम का नाम लेने भर से बचपन की कई बातें याद आ जाया करती हैं.
शहरों के चक्कर मे फासने से पहले हम छोटे कस्बों मे रहा करते थे और जो भी छोटे कस्बों मे रहे होंगे उन्हे पता होगा कि छोटे कस्बे वास्तव में गाँव ही होते हैं. हमारे घर के आस पास खूब आम के पेड़ हुआ करते थे कुछ हमारे और कुछ औरों के. जाड़े ख़त्म होते होते आम के पेड़ो पर नये पत्ते आ जाते थे. हम बच्चे उन पत्तों को बड़े चाव से देखते और इंतज़ार करते आम मे बौर आने का.
वैसे सच तो ये है कि हम मे से कुछ उन कोमल चटख रंग के पत्तो का भी स्वाद लिया करते थे.
बौर आ जाने के बाद तो फिर लोग पागल से हो जाते या यूँ कहें कि बौराने लग जाते थे.
क्या बड़े क्या बच्चे सभी घूम घूम कर आने वाली आम कि फसल का अंदाज़ा लगाया करते थे और कुछ अधीर प्रकृति के लोग तो बौर का स्वाद लेते और ये सोच कर खुश होते कि आने वाले कुछ दिनो में जिंदगी कितनी स्वादिष्ट होने जा रही है. बौर का स्वाद थोड़ा - थोड़ा आम के छिलकों जैसा होता है.बहरहाल इंतज़ार ज़्यादा नही करना पड़ता और जल्दी ही छोटे छोटे आम के फल पेड़ों कि डालियों से लटकते नज़र आने लग जाते और हमारी जिंदगी बाकी गर्मियों के लिए आम के पेड़ों के इर्द’गिर्द सिमट के रह जाती. अपने पेड़ों कि रखवाली और दूसरों के पेड़ों पर पैनी नज़र रखना हम बच्चों द्वारा अपने लिए चुना हुआ काम होता था . ये कुछ ऐसे कामों में था जिस पर कभी न तो बड़ों ने ऐतराज किया और न दखल दिया. हम जानते थे कि दूसरों के पेड़ों से मौका देखा कर तोड़ा गया आम सबसे स्वादिष्ट होता है और हमने कई बार उन आमों का अलौकिक स्वाद लिया भी है.
बड़े आमों को काई क़िस्मों मे रखा करते थे. जैसे जो आम के पेड़ खुद ही फेके हुए बीजों से लग जाते उन्हे बीजू कहा जाता था और कलमी उन पेड़ों को जिन्हे कलम करके लगाया जाता था. वैसे हम बच्चे उपयोगिता वाडी किस्म के हुआ करते थे हम जानते थे कि नाम और किस्म जैसी भौतिक चीज़ें तो अवास्तविक और बेकार कि बाते होती हैं. सच्ची चीज़ तो स्वाद है जिसे देखा नही महसूस किया जाता है. हमारे लिए खट्टे आमों का कुछ ज़्यादा ही महत्व होता था और जो लोग कच्चे आमो मे उन्हे पसंद करते जो खट्टे नही होते उन्हे हम हिकारत कि नज़र से देखते थे.
कच्चे आमों को, जब तक उसके बीज के उपर जाली बनना नही शुरू हो जाती , टिकोरा कहते हैं. और आमों का असली स्वाद तो टिकोरों मे मिलता था. हमारे यहाँ इतने पेड़ नही थे कि आम बेचे जाएँ और इस स्थिति मे बड़ों को इस बात से मतलब नही रहता था कि हम टिकोरे भी तोड़ रहे हैं क्योंकि जी भर के टिकोरे खाने और आम के अचार बनने के बाद भी जी भर के पके आम खाने के लिए आम बचे रह जाते.
टिकोरे कई तरह से खाए जाते थे. हममे से कुछ जलबाज़ तो टिकोरा हाथ मे आने के बाद उनसे छीन लिया जाए इस दर से उसे छिलके सहित खा लेते थे. वैसे हमारे पास पूरा प्रबंध रहता था. मसलन छोटी सी प्लेट, नदियों के पास पाई जाने वाली सीपी जिसने आधे हिस्से को पत्थर कि सिल पर घिस कर छीलनी बना ली जाती थी, पीसा हुआ नमक और पीसी हुई लाल मिर्च.कायदा ये था कि पहले टिकोरे का छिलका उतरा जाता और फिर उसके पतले पतले छिलके बनाए जाते. इसके बाद उसमें नमक और लालमिर्च मिलाई जाती और फिर सभी भाई-बहन उसे मिलकर खाते. उसे तैयार करने कि पूरी प्रक्रिया के दौरान सभी के मूह में बेतहाशा पानी आता रहता.
थोड़ा बड़े टिकोरे घर के अंदर ले जाए जाते और पुदीने के साथ पीस कर चटनी बनाई जाती. मेरे जैसे बच्चे जो हरी सब्जियाँ खाने मे थोड़ा नकचढ़े थे, पूरे मौसम इसी आम और पुदीने कि चटनी पर गुज़रा करते. सच तो ये है कि मैने पूरा खाना सिर्फ़ मेसों में ही खाया है.
कुछ और बड़े होने पर आम में हल्की हल्की जाली पड़ने लग जाती. पेड़ के नीचे कि वो नमक और लालमिर्च वाली चीज़ तो जारी रहती पर साथ ही साथ दाल में आम पड़ने लग जाता. और आम के दो टुकड़े कर के उसे गुड में पका कर मीठी खटाई बनाई जाती और रोटी के साथ मज़े से खाई जाती. कभी कभी आम को उबाल कर उसे मसल लिया जाता और उसमे जाने क्या क्या मिला कर आम का पना बनाया जाता . बड़े कहते थे कि इसको पीने से लू से राहत मिलती है. राहत का तो पता नही पर होता था ये बहुत ही स्वादिष्ट.
इसी समय एक महान युद्ध छिड़ जाता जब अपने आमों को बचाना और दूसरों के आमो को झटकना होता था. गर्मी के उन दिनो में अक्सर आँधी आ जाती है और आम जाम के गिरते हैं. दिन क़ी आँधिया तो ठीक होती थीं क्योंकि सभी अपने पेड़ों के नीचे जमे रहते थे पर अगर रात में आँधी आई तो पहले जागने वाला फ़ायदे में रहता था. इसका उपचार यही था कि आँधी आते ही नींद खुल जाए और रात ही रात गिरे हुए आमों पर कब्जा कर लिया जाए. न जाने कितनी रातें हम लोगों ने पेड़ के नीचे आम बीनते हुए गुज़ार दी हैं. मज़ा आती थी उन रातों में भी.एक और तरीका होता था जो ज़रा ख़तरनाक होता था और उसमे आम भी नही मिलते थे. ये तरीका शुद्ध रूप से ईर्ष्यभरे हृदयों क़ी उपज था. इसमे दूसरों के पेड़ो के आम किसी भी तरह पत्थर मार के गिरने का था जिससे उसके पेड़ में आम कम हो जाएँ. किसी के ऐसे ही प्रयोग के दरम्यान एक बार मेरे सर पर बड़ा सा पत्थर आ के गिरा जिसका निशान अभी तक है.
इस बीच हम आम के पेड़ों पर चढ़ कर अचार के लिए आम का बंदोबस्त करने में जुट जाते. अचार के आम ज़मीन पर नही गिरे होने चाहिए क्योंकि इससे बनने वाले अचार खराब हो जाते हैं. जो आम पेड़ पर चढ़ कर मिल जाते वो तो ठीक थे पर बाकी आमों के लिए लंबे से बाँस के टुकड़े में छोटी सी खपच्ची बाँध कर लग्गी बनाई जाती और आम उसमे फँसा के तोड़े जाते, नीचे उसे लपकने के लिए दूसरे तैयार रहते. जो आम हाथ में आ जाते उनका अचार बनता और बचे हुए आम सूखा कर खटाई बना दिए जाते. मुझे लगता है क़ी आम लपकने में मैने थोड़ी मेहनत क़ी होती तो आज मै भी IPL , ICL क़ी किसी टीम का स्टार खिलाड़ी होता.
जब अचार बनने शुरू होते तो हम बच्चे उसमे सक्रिय रूप से अपना योगदान करते. आम क़ी फांके काटने से लेकर ताज़ा बने अचार को चखने और फिर चोरी से खाने तक.और यूँ एक दिन बारिश शुरू हो जाती और बड़े घोषणा कर देते क़ी अब आम पकने लगेंगे.
इस तरह एक युग क़ी समाप्ति होती और दूसरा दौर पके आमों का शुरू होता.
कभी कभी लगता है क़ी जितनी मस्ती हमारी पीढ़ी ने कर ली है क्या उतनी मस्ती अब के बच्चे कभी कर पाएँगे.शायद उनकी मस्ती के मायने अलग होते हैं, शायद उन्हे उन सब में रोमांच भी मिलता हो पर ज़रा सोचिए वो अमराइयाँ वो तरह तरह के आम और वो दिन भर घर से बाहर और बिना किसी चिंता के.पता नहीपके आमों पर फिर कभी………